गन्ने की खोज कैसे हुई यह भारत कैसे पहुंचा? जानिए इसका हजारों साल पुराना इतिहास

गन्ना सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि दुनिया की मिठास का राजा है, जिसने सभ्यताओं को जोड़ा और अर्थव्यवस्था को गति दी। इसका इतिहास हजारों साल पुराना है, और यह कहानी जंगलों से शुरू होकर खेतों तक पहुंची। गन्ने की जड़ें न्यू गिनी में मानी जाती हैं, जहां इसे करीब 10,000 साल पहले उगाया गया। वहां के लोग इसे चबाकर मिठास निकालते थे, जो शुरुआती प्रयोग था। धीरे-धीरे यह पौधा समुद्री यात्राओं और व्यापार के रास्तों से एशिया और भारत तक पहुंचा। भारत में इसकी खेती ने मिठास को नया रूप दिया, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। आइए जानते हैं कि गन्ना कहां से आया, कैसे भारत में फला-फूला, और आज इसके क्या फायदे हैं।

गन्ने की शुरुआत, न्यू गिनी से दुनिया तक

गन्ने की कहानी न्यू गिनी से शुरू होती है, जहां इसे करीब 8000-10,000 साल पहले घरेलू बनाया गया। वहां के लोग Saccharum officinarum को उगाकर चबाते थे और इसके रस का आनंद लेते थे। बाद में यह पौधा ऑस्ट्रोनेशियन लोगों के साथ दक्षिण-पूर्व एशिया, इंडोनेशिया, और फिर भारत तक पहुंचा। करीब 3000 साल पहले भारत में इसकी खेती शुरू हुई, जहां लोग इसे नई तकनीक से मिठास में बदलने लगे। न्यू गिनी से निकलकर गन्ना चीन और दक्षिण एशिया में फैला, और वहां इसके साथ प्रयोग हुए। यह पौधा इतना खास था कि इसे व्यापार का हिस्सा बनाया गया, जो इसकी यात्रा को और रोचक बनाता है।

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भारत में गन्ने का आगमन

भारत में गन्ना करीब 1200-1000 ईसा पूर्व पहुंचा, जब ऑस्ट्रोनेशियन व्यापारी इसे लाए। प्राचीन ग्रंथों में इसे “इक्षु” कहा गया, जो संस्कृत में घास का प्रतीक है। वाल्मीकि रामायण में भी इसका जिक्र मिलता है, जहां इसे राजा इक्ष्वाकु से जोड़ा गया, जिन्होंने इसके रस को निकालने की शुरुआत की। गुप्त काल (350 ईस्वी) में भारतीयों ने गन्ने के रस को उबालकर चीनी के क्रिस्टल बनाने की तकनीक ईजाद की, जो दुनिया के लिए नई थी। इस मिठास ने व्यापार को बढ़ावा दिया, और अरब व्यापारियों ने इसे मध्य पूर्व तक पहुंचाया। बाद में, अरबों ने इसे स्पेन (715 ईस्वी) और यूरोप तक फैलाया, लेकिन भारत इसका असली घर बना।

गन्ने का वैश्विक सफर

भारत से गन्ना अरब व्यापारियों के जरिए मिस्र, फारस, और भूमध्यसागरीय देशों तक गया। छठी सदी में फारसी इसे “शहद देने वाली घास” कहते थे, और अरबों ने इसकी खेती को बड़े पैमाने पर शुरू किया। Crusaders ने इसे यूरोप में लाया, जहां इसे “मीठा नमक” कहा गया। 15वीं सदी में पुर्तगाली और स्पेनिश खोजकर्ताओं ने इसे अमेरिका और कैरिबियन तक पहुंचाया, जहां गुलामी के दौर में इसकी खेती फली-फूली। आज ब्राजील और भारत गन्ने के सबसे बड़े उत्पादक हैं, जो इसकी वैश्विक यात्रा का सबूत है। भारत में इसकी खेती ने न सिर्फ चीनी दी, बल्कि गुड़ और खांडसारी जैसे देसी उत्पाद भी दिए।

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आधुनिक प्रयोग और फायदे

आज गन्ना सिर्फ मिठास का स्रोत नहीं, बल्कि ऊर्जा का भंडार है। इसके बचे हुए हिस्से (बैगास) से बिजली बनाई जाती है, और शराब उद्योग में इसके रस का इस्तेमाल होता है। भारत में पेट्रोल में 5-10% इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य गन्ने से पूरा हो रहा है, जो प्रदूषण कम करने में मदद करेगा। एक एकड़ में औसत 70-80 टन गन्ना पैदा हो सकता है, जिससे चीनी, गुड़, और बिजली मिलती है। अगर बाजार में चीनी का दाम 35-40 रुपये प्रति किलो हो, तो आय 1,00,000-1,50,000 रुपये प्रति एकड़ हो सकती है। लागत 30,000-50,000 रुपये प्रति एकड़ आने पर शुद्ध लाभ 50,000-1,00,000 रुपये तक पहुंच सकता है।

गन्ने की खेती के लिए गर्म और नम मौसम, 1000-1500 मिमी बारिश, और उपजाऊ मिट्टी चाहिए। इसे 20-35 डिग्री तापमान में अच्छा बढ़ावा मिलता है। पौधे को हर 10-15 दिन में पानी दें और जैविक खाद डालें ताकि पैदावार बढ़े। कीटों से बचाने के लिए नीम की पत्तियों का छिड़काव करें। भविष्य में गन्ने को इथेनॉल और बायोफ्यूल के लिए और बढ़ावा मिलेगा, जो किसानों की आय को दोगुना कर सकता है। मौसम की जानकारी रखें और नई तकनीक अपनाएं, ताकि यह फसल आने वाले सालों में भी मुनाफे का सौदा बनी रहे।

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  • Dharmendra

    मै धर्मेन्द्र एक कृषि विशेषज्ञ हूं जिसे खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी साझा करना और नई-नई तकनीकों को समझना बेहद पसंद है। कृषि से संबंधित लेख पढ़ना और लिखना मेरा जुनून है। मेरा उद्देश्य है कि किसानों तक सही और उपयोगी जानकारी पहुंचे ताकि वे अधिक उत्पादन कर सकें और खेती को एक लाभकारी व्यवसाय बना सकें।

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