FOM: किसानों के लिए नई खाद बनी वरदान, पैदावार बढ़ेगी और आयात पर घटेगा खर्च

भारत की खेती आज एक बड़े बदलाव के रास्ते पर है। सालों तक रासायनिक खादों का इस्तेमाल करने से फसलों की पैदावार तो बढ़ी, लेकिन मिट्टी की ताकत कम होती चली गई। यूरिया और डीएपी जैसे खादों के लिए विदेशों पर निर्भरता ने कई बार किसानों को मुश्किल में डाला। कभी खाद की कमी, तो कभी ऊँची कीमतों ने अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी। लेकिन अब एक नया रास्ता दिख रहा है, जिसका नाम है एफओएम यानी किण्वित जैविक खाद (Fermented Organic Manure)। यह खाद मिट्टी को फिर से हरा-भरा बनाने और किसानों की जिंदगी को आसान करने का वादा करती है।

एफओएम क्या है और कैसे बनती है?

एफओएम कोई साधारण गोबर की खाद नहीं है। यह एक खास तरीके से बनाई गई जैविक खाद है, जिसे तैयार करने में वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के वैज्ञानिक इस पर गहन शोध कर रहे हैं। इसे बनाने के लिए गाँवों में आसानी से मिलने वाली चीजों जैसे गोबर, पराली, गन्ने की खोई, और सब्जियों के छिलकों का इस्तेमाल होता है। इन सबको एक बड़े टैंक में डाला जाता है, जिसे डाइजेस्टर कहते हैं। इस टैंक में हवा के बिना लाखों सूक्ष्मजीव इन चीजों को तोड़ते हैं। इस प्रक्रिया को किण्वन कहते हैं।

इसके दो बड़े फायदे हैं। पहला, इससे बायोगैस बनती है, जो साफ और हरा-भरा ईंधन है। दूसरा, जो गाढ़ा घोल बचता है, उसे प्रोसेस करके ठोस और तरल एफओएम बनाया जाता है। यह खाद पारंपरिक खाद से कई गुना बेहतर है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटाश जैसे पोषक तत्व ऐसे रूप में होते हैं, जो पौधों को तुरंत मिल जाते हैं।

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मिट्टी और फसलों के लिए वरदान

एफओएम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह मिट्टी को फिर से जिंदा करता है। पूसा के वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार सिंह बताते हैं कि यह खाद मिट्टी को ढीली और भुरभुरी बनाती है। इससे मिट्टी पानी को बेहतर तरीके से सोखती है और उसमें केंचुए व अन्य छोटे-छोटे जीव बढ़ते हैं, जो खेती के लिए बहुत अच्छे हैं। यह मिट्टी के पीएच स्तर को भी ठीक करता है, यानी अगर मिट्टी ज्यादा खट्टी या क्षारीय हो, तो उसे उपजाऊ बनाता है।

रासायनिक खाद तो एक बार में सारा पोषण दे देती है और खत्म हो जाती है, लेकिन एफओएम धीरे-धीरे पोषक तत्व छोड़ता है। इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं, और वे कीटों व बीमारियों से लड़ने में सक्षम हो जाते हैं। इसका असर सीधे फसलों पर दिखता है। चाहे गेहूं हो, धान हो, या मक्का, एफओएम से फसल की पैदावार बढ़ती है और अनाज का स्वाद, आकार, और पोषण भी बेहतर होता है। यह पूरी तरह प्राकृतिक है, इसमें कोई हानिकारक रसायन नहीं, जो मिट्टी या इंसानों की सेहत को नुकसान पहुंचाए।

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किसानों और देश की जेब को राहत

एफओएम का इस्तेमाल न सिर्फ खेती के लिए अच्छा है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है। भारतीय बायोगैस एसोसिएशन के मुताबिक, अगर इसका सही तरीके से उपयोग हो, तो हर साल 12,500 करोड़ रुपये की रासायनिक खाद के आयात को बचाया जा सकता है। यह भारत को खाद में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। साथ ही, बायोगैस संयंत्रों से पराली जलाने की समस्या भी कम होगी, क्योंकि पराली को अब खाद और ईंधन बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पर्यावरण के लिए भी बड़ी राहत है।

वर्तमान में भारत में करीब 10 लाख मीट्रिक टन एफओएम बन रहा है, और यह सिर्फ शुरुआत है। देश में 97 बायोगैस संयंत्र काम कर रहे हैं, और 570 से ज्यादा बन रहे हैं। आने वाले समय में यह बाजार अरबों रुपये का हो सकता है, जिसमें तरल एफओएम की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी।

सरकार का साथ

केंद्र सरकार भी एफओएम को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से कमर कस चुकी है। गोबरधन योजना के तहत हर टन एफओएम पर 1500 रुपये की सब्सिडी दी जा रही है, ताकि यह किसानों की जेब पर भारी न पड़े। कृषि विज्ञान केंद्रों और यूनिवर्सिटी के जरिए गाँव-गाँव में इसके फायदे बताए जा रहे हैं। हाल ही में सरकार ने बायोगैस संयंत्रों से बनी खाद को उर्वरक की श्रेणी में शामिल किया है, जिससे इसे बेचना और इस्तेमाल करना और आसान हो गया है। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जैसे रिलायंस और मारुति सुजुकी भी इस दिशा में काम कर रही हैं, जो इसकी बढ़ती माँग को दिखाता है।

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  • Shashikant

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