भारत में अचानक बढ़ी मांग और घरेलू स्तर पर कम हुए भंडार ने वैश्विक बाजार को हिला दिया है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूरिया की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है। मध्य पूर्व में हाल ही में भारत के पिछले अनुबंध की दर 530 डॉलर प्रति टन (CFR) थी, लेकिन अब उम्मीद जताई जा रही है कि 2 सितंबर को खुलने वाले नए टेंडर में यह कीमत करीब 500 डॉलर प्रति टन तक लाई जा सकती है।
वैश्विक बाजार की स्थिति
विशेषज्ञों के अनुसार गुरुवार को मध्य पूर्व में यूरिया का FOB भाव 506.25 डॉलर प्रति टन दर्ज किया गया। इसमें भाड़ा और बीमा जोड़ने के बाद भारत तक कीमत CFR आधार पर और भी बढ़ जाती है। चूंकि यूरिया का लेन-देन किसी औपचारिक प्लेटफॉर्म पर नहीं होता, बल्कि खरीदार और विक्रेता के बीच सीधी बातचीत से दरें तय होती हैं, इसलिए दामों में उतार-चढ़ाव बहुत तेज़ रहता है।
इंडोनेशिया–मलेशिया और भारत की भूमिका
उद्योग सूत्रों का मानना है कि इंडोनेशिया और मलेशिया पहले ही चीन को दरें घटाने के लिए राजी कर चुके हैं। अब भारत की अगली बोली में भी 500 डॉलर प्रति टन के आसपास का कोटेशन मिलने की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो मध्य पूर्व के उत्पादकों पर भी दाम घटाने का दबाव बढ़ेगा और भारतीय किसानों को कुछ राहत मिल सकती है।
ये भी पढ़ें- IIVR वाराणसी ने लोबिया और भिंडी की किस्मों का जारी किया लाइसेंस, किसानों को होगा बड़ा फायदा
घरेलू हालात और सरकारी रणनीति
फर्टिलाइज़र मंत्रालय के मुताबिक जून 2025 में यूरिया का औसत अंतरराष्ट्रीय (FOB) भाव 395 डॉलर प्रति टन रहा, जो पिछले साल की तुलना में 15% ज्यादा है। सरकार ने आयात बढ़ाने का फैसला किया, लेकिन अचानक बड़ी मात्रा में खरीद से वैश्विक कीमतों पर दबाव और बढ़ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को धीरे-धीरे, महीनेवार डिलीवरी लक्ष्य तय करके खरीद करनी चाहिए थी, ताकि किसानों की मांग और आपूर्ति संतुलन बनाए रखा जा सके।
उत्पादन और आयात की स्थिति
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में यूरिया का घरेलू उत्पादन 3.07 करोड़ टन और आयात 56 लाख टन रहा। पिछले साल के बचे हुए भंडार से 3.87 करोड़ टन खपत को पूरा किया गया। इस साल सरकार ने अगस्त के पहले हफ्ते में ही 20 लाख टन खरीद का फैसला कर लिया और सितंबर की शुरुआत तक और 20 लाख टन की मंजूरी देने की संभावना है। इसी बीच नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड ने 15 अगस्त को पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर 10-10 लाख टन यूरिया आपूर्ति के लिए टेंडर जारी कर दिए हैं।
ये भी पढ़ें- सितंबर-अक्टूबर की यह फसल बना देगी लखपति, कुछ ही महीनों में होगी बंपर कमाई!
भंडार और किसानों की मांग
14 अगस्त तक यूरिया का समापन भंडार केवल 29.6 लाख टन रहा, जो पिछले साल की तुलना में 61% कम है। इस दौरान अप्रैल से जून के बीच आयात में 12.7% और घरेलू उत्पादन में 10.2% की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर, धान और मक्का की खेती का रकबा बढ़ने से यूरिया की खपत तेजी से बढ़ गई है। धान का क्षेत्रफल 7.6% बढ़कर 420.41 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जबकि मक्का का रकबा 11.7% बढ़कर 93.34 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसके विपरीत तिलहन और कपास की खेती में गिरावट देखने को मिली है।
किसानों पर असर
यूरिया की बढ़ती कीमत और घटता भंडार किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। धान और मक्का जैसी फसलों की बढ़ी हुई बुवाई के बीच समय पर खाद की उपलब्धता न होने से पैदावार पर असर पड़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करे और कालाबाजारी पर कड़ी निगरानी रखे, ताकि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध हो सके।
ये भी पढ़ें- गाजीपुर में यूरिया खाद की किल्लत किसान परेशान, कालाबाजारी के आरोप