आलू किसानों के लिए अलर्ट! सर्दी-कोहरे में झुलसा रोग का खतरा, वैज्ञानिकों ने जारी की चेतावनी

उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इन दिनों कड़ाके की ठंड और घना कोहरा छाया हुआ है। मौसम विभाग ने अगले कई दिनों तक इसी तरह की स्थिति बने रहने का अनुमान जताया है। इस मौसम में आलू की फसल सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ठंड और नमी से आलू में अर्ली ब्लाइट और लेट ब्लाइट रोग तेजी से फैल सकते हैं। अगर समय पर उपाय नहीं किए गए तो फसल में पत्तियां सूखने लगेंगी, कंद का विकास रुक जाएगा और पैदावार में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि घना कोहरा और कम तापमान फफूंड जनित रोगों के लिए सबसे अनुकूल हालात बनाता है। अर्ली ब्लाइट में पत्तियों पर गहरे भूरे या काले धब्बे पड़ते हैं, जो धीरे-धीरे फैलकर पूरी पत्ती को जला देते हैं। लेट ब्लाइट में पत्तियों पर सफेद-भूरे धब्बे बनते हैं और फसल तेजी से सूख जाती है। ये दोनों रोग कंद तक पहुंचकर सड़न पैदा कर सकते हैं। कई किसान भाई पहले से ही खेतों में ये लक्षण देख रहे हैं और घबरा रहे हैं।

रोग के लक्षण कैसे पहचानें और शुरुआती चरण में क्या करें

वैज्ञानिकों ने बताया कि रोग की शुरुआत पत्तियों के निचले हिस्से से होती है। अगर पत्तियों पर छोटे-छोटे गोल धब्बे दिखें या पत्तियां पीली पड़कर मुड़ने लगें तो समझ जाएं कि ब्लाइट शुरू हो गया है। कोहरे की वजह से नमी ज्यादा रहती है, जिससे रोग तेजी से फैलता है। शुरुआती दौर में ही उपाय कर लें तो फसल बच सकती है।

सबसे पहले खेत में अच्छा जल निकास सुनिश्चित करें। पानी जमा न होने दें, क्योंकि जलभराव रोग को और बढ़ावा देता है। पौधों के बीच हवा का प्रवाह अच्छा रखें ताकि नमी कम हो। अगर पत्तियां ज्यादा प्रभावित हैं तो उन्हें छांटकर जला दें। खेत को साफ रखें और खरपतवार निकालते रहें।

फफूंदनाशक स्प्रे और अन्य उपाय: वैज्ञानिकों की सलाह

कानपुर के वैज्ञानिकों ने स्पष्ट सलाह दी है कि रोग दिखते ही फफूंदनाशक का छिड़काव शुरू करें। अर्ली ब्लाइट के लिए मैंकोजेब या क्लोरथलोनिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से स्प्रे करें। लेट ब्लाइट के लिए मेटालैक्सिल + मैंकोजेब या फेनामिडोन + मैंकोजेब का मिश्रण कारगर है। स्प्रे सुबह या शाम के समय करें जब हवा कम हो। पहला स्प्रे लक्षण दिखते ही करें और 7-10 दिन के अंतर पर दोबारा दोहराएं। अगर रोग ज्यादा फैल गया है तो दो अलग-अलग दवाओं का वैकल्पिक इस्तेमाल करें ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता न बढ़े।

साथ ही मिट्टी चढ़ाई का काम पूरा कर लें। पौधों के तने तक भुरभुरी मिट्टी चढ़ाएं ताकि कंद अच्छे से बैठें और रोग कंद तक न पहुंचे। सिंचाई दोपहर के समय हल्की करें। ज्यादा पानी न दें और जलभराव से बचें। खाद का संतुलन रखें – ज्यादा नाइट्रोजन न डालें क्योंकि ये रोग को बढ़ावा देता है। पोटाश युक्त खाद डालने से पौधे मजबूत बनते हैं और ठंड सहन कर पाते हैं।

किसान भाइयों के लिए खास सावधानियां

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मौसम में रोज खेत की जांच जरूरी है। अगर रोग शुरुआत में पकड़ में आ जाए तो नुकसान बहुत कम होता है। जैविक तरीके भी अपनाएं – ट्राइकोडर्मा या नीम आधारित स्प्रे से शुरुआत करें। अगर रासायनिक दवा इस्तेमाल कर रहे हैं तो सुरक्षात्मक उपकरण पहनें और दवा का सही मात्रा में इस्तेमाल करें।

किसान भाइयों, ये समय फसल की सेहत का सबसे महत्वपूर्ण दौर है। सही सिंचाई, मिट्टी चढ़ाई और समय पर स्प्रे से आप अपनी मेहनत को बचा सकते हैं। नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क करें और मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखें। ठंड और कोहरे से लड़कर भी अच्छी पैदावार लेना संभव है।

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  • Shashikant

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