तिखुर (सफेद हल्दी) की खेती से करें तगड़ी कमाई! जानें उगाने का तरीका, फायदे और बाजार मूल्य

Tikhur ki Kheti In Hindi : किसान भाइयों के लिए एक नई और फायदेमंद फसल की खबर है। तिखुर, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Curcuma angustifolia कहते हैं, हल्दी परिवार का एक अनमोल औषधीय पौधा है। इसे सफेद हल्दी या ट्वाक्सिरा के नाम से भी जाना जाता है। इसकी कंदिल जड़ों से निकलने वाली कपूर जैसी सुगंध इसे जंगल में आसानी से पहचानने में मदद करती है। तिखुर के कंदों से बनने वाला स्टार्च असली आरारोट के रूप में इस्तेमाल होता है, जिसकी बाजार में बढ़ती मांग है। आयुर्वेदिक दवाओं, फलाहारी भोजन और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता के चलते तिखुर की खेती किसानों के लिए कम लागत में मोटी कमाई का रास्ता खोल रही है।

तिखुर की पहचान

तिखुर का पौधा हल्दी से मिलता-जुलता है, लेकिन इसके कंद सफेद और चमकदार होते हैं। इस पौधे का तना नहीं होता, और इसकी सारी ताकत जड़ों में होती है। इन जड़ों से लंबी, मांसल संरचनाएँ निकलती हैं, जिनके सिरों पर हल्के भूरे या मटमैले रंग के कंद बनते हैं। पत्तियाँ 30-40 सेंटीमीटर लंबी, भाले जैसी और नुकीली होती हैं। फूल पीले रंग के होते हैं, जो गुलाबी सहपत्रों से घिरे रहते हैं, जिससे पौधा और आकर्षक दिखता है।

ये पौधा मध्य भारत, खासकर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और निचले हिमालयी क्षेत्रों के नम जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है। अक्टूबर-नवंबर में पत्तियाँ सूखने लगती हैं, और फरवरी-मार्च में कंद निकालने का समय होता है। आदिवासी समुदाय इसे जंगल से खोदकर सालों से इस्तेमाल करता आ रहा है।

तिखुर (सफेद हल्दी) की खेती से करें तगड़ी कमाई! जानें उगाने का तरीका, फायदे और बाजार मूल्य

कहाँ पाया जाता है तिखुर?

तिखुर मध्य भारत की मूल प्रजाति है। यह पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु (मद्रास), निचले हिमालयी क्षेत्रों, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी नम पर्णपाती साल व मिश्रित जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है। अक्टूबर-नवंबर में इसकी पत्तियाँ सूखने लगती हैं, और इस समय आदिवासी समुदाय इसे खोदकर अपने इस्तेमाल के लिए जमा करते हैं।

अप्रैल-मई में, जब पत्तियाँ पूरी तरह सूख जाती हैं, इसे जंगल में पहचानना मुश्किल हो जाता है। इसे उगाने के लिए रेतीली दोमट मिट्टी, जिसमें पानी अच्छे से निकल जाए, और 25-35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे अनुकूल होता है। आंशिक छायादार या खुले स्थान इसके कंदों के विकास के लिए बेहतर माने जाते हैं।

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औषधीय गुण और उपयोग

तिखुर का कंद मीठा, पौष्टिक और रक्त को शुद्ध करने वाला होता है। यह बच्चों और बुजुर्गों में कमजोरी को दूर करने में बहुत उपयोगी है। इसके कंद ही इसका सबसे कीमती हिस्सा हैं, जिनके लिए अब इसकी खेती भी होने लगी है। इसमें स्टार्च, आयरन, सोडियम, कैल्शियम, विटामिन-A और विटामिन-C जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

  • फलाहार में प्रयोग: तिखुर का पाउडर फलाहारी भोजन के रूप में लिया जाता है। इससे जलेबी, मिठाइयाँ, शरबत और दूध में उबालकर स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं।
  • आयुर्वेद में: इसका अर्क रक्तशोधन, बुखार, जलन, अपच, पीलिया, पथरी, अल्सर, कोढ़ और खून से जुड़ी बीमारियों में लाभकारी है।
  • सुगंधित तेल: कंदों से निकलने वाला तेल भी औषधि के रूप में काम आता है, जो इसकी महक के लिए खास होता है।

रासायनिक संरचना (प्रति 100 ग्राम)

तिखुर पाउडर में कई पोषक तत्व होते हैं, जो इसे सेहत के लिए खास बनाते हैं:

  • संतृप्त फैटी एसिड: 0.01 ग्राम
  • वसा: 0.06 ग्राम
  • प्रोटीन: 0.01 ग्राम
  • कार्बोहाइड्रेट: 82 ग्राम
  • फाइबर: 14 ग्राम
  • सोडियम: 0.02 मिलीग्राम
  • कैल्शियम: 0.09 ग्राम
  • आयरन: 13 मिलीग्राम
  • विटामिन-A: 3407 IU
  • विटामिन-C: 74 मिलीग्राम

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तिखुर की खेती का सही तरीका

भूमि और जलवायु

तिखुर की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी, जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, सबसे उत्तम है। यह आंशिक छाया या खुले स्थानों में आसानी से बढ़ता है। 25-35 डिग्री सेल्सियस का तापमान इसके लिए सबसे सही माना जाता है।

खेत की तैयारी

मई के महीने में खेत को कम से कम दो बार हल से जोत लें, ताकि मिट्टी में मौजूद कीड़े-मकोड़े खत्म हो जाएँ। इसके बाद 10-15 टन गोबर की सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टेयर डालें और फिर से जुताई करें, ताकि खाद मिट्टी में अच्छे से मिल जाए।

रोपण विधि

जून के आखिरी हफ्ते या जुलाई की शुरुआत में खेत में 30 सेमी की दूरी पर नालियाँ बनाएँ। अंकुरित कंदों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें, जिनमें अंकुर दिखें। इन टुकड़ों को नालियों के बीच की ऊँची मिट्टी में 5-10 सेमी की गहराई पर रोप दें। पौधों के बीच 20-30 सेमी की दूरी रखें, ताकि कंद अच्छे से बढ़ सकें।

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सिंचाई

रोपण के बाद तुरंत पानी दें। मानसून में अगर बारिश न हो, तो खेत को सिंचाई से नम रखें। जरूरत पड़ने पर बरसात के बाद भी हल्की सिंचाई करें।

निदाई-गुड़ाई

बरसात खत्म होने के बाद हर 20-25 दिन में खरपतवार निकालें और कंदों पर मिट्टी चढ़ाएँ। इससे कंदों का विकास सुचारू रूप से होता है।

रोग और रोकथाम

सामान्य तौर पर तिखुर में रोग या कीट नहीं लगते। लेकिन कभी-कभी पत्तियाँ पीली पड़कर उन पर काले धब्बे दिखाई दे सकते हैं। इसके लिए मोनोक्रोटोफॉस जैसे कीटनाशक का छिड़काव करें।

कटाई और संग्रह

7-8 महीने में तिखुर की फसल तैयार हो जाती है। फरवरी-मार्च में, जब पत्तियाँ पूरी तरह सूख जाएँ, कंदों को खेत से निकाल लें। बड़े मूल कंदों से छोटे “फिंगर” कंद अलग करें। फिंगर कंदों को पानी से धोकर छाया में सुखाएँ और मूल कंदों को अगली फसल के लिए बीज के रूप में सुरक्षित रखें। कुछ किसान इन कंदों को खेत में गड्ढों में छोड़ देते हैं, ताकि अगले साल फिर उगाएँ। विनाश-विहीन तरीके से 80% कंद निकाले जाते हैं और बाकी पुनर्जनन के लिए मिट्टी में छोड़ दिए जाते हैं।

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तिखुर से स्टार्च बनाने की प्रक्रिया

पारंपरिक विधि

आदिवासी भाई-बहन तिखुर को पारंपरिक तरीके से तैयार करते हैं। कंदों को पानी से धोकर साफ पत्थर पर घिसते हैं, जिससे गाढ़ा द्रव निकलता है। इसे 2-3 बार पानी में छानकर अशुद्धियाँ और रेशे हटाते हैं। फिर बारीक कपड़े से छानकर स्टार्च को सुखाते हैं और पीसकर आटा बनाते हैं। इस आटे में नासपाती जैसे कण होते हैं, जो आसानी से पच जाते हैं। व्यावसायिक स्तर पर भी यही तरीका अपनाया जाता है।

आधुनिक विधि

कंदों को छीलकर पानी से धो लें और तेज चाकू से छोटे टुकड़ों में काट लें। ग्राइंडिंग मशीन में पानी के साथ पीसकर लुगदी बनाएँ। एक मशीन आमतौर पर 30-40 किलो कंद प्रति घंटे पीस सकती है। इस लुगदी को सफेद सूती कपड़े में बाँधकर ठंडे पानी से मटके में दबाएँ। स्टार्च मटके में जम जाता है। 6 दिन तक रोज़ ठंडे पानी से धोकर निथारें, जिससे रंग पूरी तरह सफेद हो जाए। सातवें दिन स्टील की ट्रे में सुखाकर क्रिस्टल बनाएँ। 10 किलो कच्चे कंद से 1 किलो स्टार्च मिलता है, हालाँकि मिलावट के चलते कई बार 15 किलो तक लग जाते हैं।

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कम लागत, मोटा मुनाफा

तिखुर की खेती में लागत कम आती है, और मुनाफा बड़ा होता है। एक हेक्टेयर से 30-40 क्विंटल कंद मिलते हैं, जिनमें मूल और फिंगर कंद दोनों शामिल हैं। बाजार में इनका भाव 25-30 रुपये प्रति किलो है, जिससे 1,20,000 रुपये तक की कमाई हो सकती है। खेत की तैयारी, खाद, और मजदूरी का खर्च निकालने के बाद 80,000 रुपये तक का शुद्ध मुनाफा मिल सकता है। स्टार्च बनाकर बेचने से और ज्यादा फायदा होता है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में किसान इस फसल को बड़े पैमाने पर उगा रहे हैं, और बड़े शहरों में इसकी मांग बढ़ रही है। आयुर्वेदिक दवाओं और फलाहारी खाने की बढ़ती लोकप्रियता ने तिखुर को और कीमती बना दिया है।

किसानों के लिए जरूरी सलाह

तिखुर की खेती शुरू करने से पहले नजदीकी कृषि केंद्र से संपर्क करें, जहाँ से बीज और खेती की जानकारी मिल सकती है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश या नम इलाकों में रहने वाले किसानों के लिए ये फसल खास फायदेमंद है। खेत की मिट्टी की जाँच करवाएँ और पानी के निकास का ध्यान रखें। कंदों को रोपते समय सावधानी बरतें, ताकि अंकुर टूटें नहीं। स्टार्च बनाते समय साफ-सफाई का ख्याल रखें, क्योंकि शुद्ध स्टार्च की कीमत ज्यादा मिलती है। कुछ किसान तिखुर को ऑनलाइन बेचकर भी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। स्थानीय मंडियों के साथ-साथ बड़े शहरों में सप्लाई का इंतजाम करें।

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Author

  • Rahul Maurya

    मेरा नाम राहुल है। मैं उत्तर प्रदेश से हूं और मैंने संभावना इंस्टीट्यूट से पत्रकारिता में शिक्षा प्राप्त की है। मैं Krishitak.com का संस्थापक और प्रमुख लेखक हूं। पिछले 3 वर्षों से मैं खेती-किसानी, कृषि योजनाएं, और ग्रामीण भारत से जुड़े विषयों पर लेखन कर रहा हूं।

    Krishitak.com के माध्यम से मेरा उद्देश्य है कि देशभर के किसानों तक सटीक, व्यावहारिक और नई कृषि जानकारी आसान भाषा में पहुँचे। मेरी कोशिश रहती है कि हर लेख पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और उपयोगी साबित हो, जिससे वे खेती में आधुनिकता और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकें।

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