किसान भाइयों, हमारे देश में उसर भूमि (क्षारीय या बंजर मिट्टी) खेती के लिए चुनौती बनी हुई है। उच्च pH, खराब जलनिकासी, और नमक की परतों के कारण यह भूमि सामान्य फसलों के लिए अनुपयुक्त मानी जाती है। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और विशेष धान की किस्मों की मदद से इस बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकता है। CSR 30, CSR 36, CSR 43, और Narendra Usar Dhan 3 जैसी किस्में उसर भूमि में धान की खेती को लाभकारी बना रही हैं। यह लेख किसानों को वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी देगा।
उसर भूमि की पहचान और चुनौतियाँ
उसर भूमि की मिट्टी में सोडियम की अधिकता और जैविक पदार्थों की कमी होती है। इसका pH स्तर 8.5 से ऊपर होता है, जिससे पौधों को पोषक तत्व अवशोषित करने में कठिनाई होती है। खेतों में सख्त मिट्टी, दरारें, और सतह पर सफेद नमक की परत दिखाई देती है। जलनिकासी की कमी के कारण पानी जमा हो जाता है, जो फसलों को नुकसान पहुँचाता है। सामान्य धान की किस्में ऐसी मिट्टी में असफल हो जाती हैं। लेकिन सही तकनीक और उन्नत किस्मों से इस समस्या का समाधान संभव है।
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उन्नत धान की किस्में
CSR 30 एक सुगंधित धान की किस्म है, जिसे केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) ने विकसित किया। यह नमक सहनशील है और बास्मती की गुणवत्ता वाली है। इसकी उपज 4-5 टन प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। CSR 36 क्षारीय मिट्टी के लिए उपयुक्त है और इसकी लंबी बालियाँ अच्छी पैदावार देती हैं। CSR 43 सूखा और क्षारीयता दोनों में सहनशील है, साथ ही रोग प्रतिरोधी भी। नरेंद्र उसर धान 3 (NUD 3) उत्तर प्रदेश के उसर क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है, जिसकी उपज 25-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। ये किस्में कमजोर मिट्टी में भी अच्छा प्रदर्शन करती हैं।
खेत की वैज्ञानिक तैयारी
उसर भूमि में धान की खेती के लिए खेत की सही तैयारी जरूरी है। सबसे पहले मिट्टी परीक्षण करवाएँ, ताकि pH और लवणता का स्तर पता चल सके। खेत को समतल करें और जलनिकासी के लिए नालियाँ बनाएँ। प्रति हेक्टेयर 2-4 टन जिप्सम डालें, जो सोडियम को कम करता है और मिट्टी की संरचना सुधारता है। इसके अलावा, 4-5 टन गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट मिलाएँ, जो जैविक पदार्थ बढ़ाता है। जिप्सम और खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिलाने के लिए खेत को जोतें और 10-15 दिन तक पानी भरकर रखें।
उर्वरक और जल प्रबंधन
उसर भूमि में संतुलित उर्वरक देना महत्वपूर्ण है। प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फॉस्फोरस, और 40 किलोग्राम पोटाश डालें। जिंक सल्फेट (25 किलोग्राम/हेक्टेयर) और सल्फर, बोरोन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी जरूरी हैं। नाइट्रोजन को तीन हिस्सों (रोपाई, टिलरिंग, और फूल आने के समय) में डालें। जल प्रबंधन में सावधानी बरतें। अधिक पानी से नमक सतह पर आ सकता है। ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग करें और खेत में 2-5 सेमी पानी रखें। जलनिकासी नालियाँ लवण को बहने में मदद करती हैं।
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खरपतवार और रोग नियंत्रण कैसे करें
उसर भूमि में खरपतवार जल्दी पनपते हैं। रोपाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। ब्यूटाक्लोर या पेंडीमेथालिन जैसे खरपतवारनाशकों का उपयोग करें। ब्लास्ट, शीथ ब्लाइट, और ब्राउन स्पॉट जैसे रोगों से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा या कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें। नीम तेल (10 मिली/लीटर पानी) भी कीट नियंत्रण में प्रभावी है। फसल चक्र अपनाएँ, जैसे धान के बाद सरसों या मूँग की खेती करें, जो मिट्टी की सेहत सुधारती है।
देसी और जैविक तैयारी
उसर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए देसी तरीके कारगर हैं। मिट्टी परीक्षण करवाएँ, ताकि क्षारीयता का सही अनुमान लगे। प्रति हेक्टेयर 4-5 टन गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट डालें। यह मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाता है और नमी बनाए रखता है। जिप्सम (2-4 टन/हेक्टेयर) का उपयोग सोडियम को कम करता है। बिहार के पूर्णिया में किसानों ने गोबर और जिप्सम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई। हरी खाद जैसे ढैंचा या सनई को 40-50 दिन तक उगाकर जोत दें। यह मिट्टी में फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जोड़ता है। खेत को समतल करें और जलनिकासी के लिए नालियाँ बनाएँ।
उसर भूमि अब बंजर नहीं रही। CSR 30, CSR 36, CSR 43, और NUD 3 जैसी किस्में और जिप्सम, उर्वरक प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक तकनीकें इसे उपजाऊ बना सकती हैं। अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से बीज और सलाह लें। वैज्ञानिक खेती अपनाएँ और बंजर भूमि को सोना उगलने वाली बनाएँ।
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