Ashwagandha ki kheti In Hindi : अश्वगंधा एक ऐसी औषधीय फसल है, जो भारत में प्राचीन काल से आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं में इस्तेमाल होती रही है। इसका वैज्ञानिक नाम विथानिया सोम्नीफेरा है और इसे असगंध के नाम से भी जाना जाता है। आयुर्वेद में इसके गुणों की खूब तारीफ की गई है। ये पौधा न सिर्फ सेहत के लिए फायदेमंद है, बल्कि किसानों के लिए भी कमाई का शानदार ज़रिया बन सकता है।
आजकल पारंपरिक खेती में हो रहे नुकसान को देखते हुए अश्वगंधा की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। ये कम लागत में अच्छा मुनाफा देती है और प्राकृतिक आपदाओं का इस पर कम असर पड़ता है। भारत के कई राज्य जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब में इसकी खेती बड़े पैमाने पर हो रही है।
अगर आप भी अश्वगंधा की खेती शुरू करना चाहते हैं, तो ये आपके लिए सुनहरा मौका हो सकता है। आइए जानते हैं कि अश्वगंधा की खेती कैसे करें, इसके लिए क्या चाहिए और इससे कितनी कमाई हो सकती है।
अश्वगंधा की खेती क्यों फायदेमंद?
अश्वगंधा की खेती इसलिए फायदेमंद है क्योंकि ये कम पानी और कम देखभाल में भी अच्छी पैदावार देती है। इसकी जड़ों और पत्तियों में घोड़े की मूत्र जैसी गंध आती है, इसलिए इसे अश्वगंधा कहा जाता है। ये एक नकदी फसल है, जिसकी माँग आयुर्वेदिक दवाओं, हर्बल प्रोडक्ट्स और सप्लीमेंट्स में बढ़ रही है। बाज़ार में इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है।
ये फसल 5-6 महीने में तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को जल्दी मुनाफा मिल जाता है। साथ ही, इसे उगाने के लिए खास मशक्कत की ज़रूरत नहीं होती। सरकार भी औषधीय फसलों को बढ़ावा दे रही है, जिसके तहत कुछ राज्यों में सब्सिडी मिलती है। ये सब मिलकर अश्वगंधा को किसानों के लिए एक शानदार विकल्प बनाते हैं।
खेती के लिए सही जलवायु और मिट्टी- Ashwagandha ki kheti In Hindi
अश्वगंधा की खेती के लिए गर्म और शुष्क जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है। ये 20-35 डिग्री सेल्सियस तापमान में अच्छे से बढ़ता है। ठंडे इलाकों को छोड़कर ये भारत के लगभग हर हिस्से में उगाया जा सकता है। मिट्टी की बात करें, तो बलुई दोमट या हल्की रेतीली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त है। मिट्टी का pH 7.5 से 8 के बीच होना चाहिए। जल निकास की अच्छी व्यवस्था ज़रूरी है, क्योंकि जलभराव से इसकी जड़ें सड़ सकती हैं। अगर खेत में नमी अच्छी हो और पानी निकासी की सुविधा हो, तो पैदावार बढ़िया होगी।
बुवाई का सही समय और तरीका
अश्वगंधा की बुवाई के लिए जुलाई से सितंबर का समय सबसे अच्छा है। इस दौरान मानसून की बारिश शुरू हो जाती है, जिससे खेत में नमी बनी रहती है। बुवाई से पहले खेत की दो-तीन बार जुताई करें और ढेले तोड़कर मिट्टी को भुरभुरा बना लें। प्रति हेक्टेयर 8-10 टन गोबर की सड़ी खाद डालें, ताकि मिट्टी को पोषण मिले। बीज की मात्रा 10-12 किलो प्रति हेक्टेयर रखें। बीजों को 1-2 सेंटीमीटर गहराई पर बोया जाता है। पंक्तियों के बीच 20-25 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 10 सेंटीमीटर की दूरी रखें। बुवाई के बाद हल्की सिंचाई करें। अगर बीज की गुणवत्ता अच्छी हो, तो 25-30 दिन में पौधे तैयार हो जाते हैं।
अश्वगंधा की उन्नत किस्में
अश्वगंधा की कई उन्नत किस्में हैं, जो अच्छी पैदावार और गुणवत्ता देती हैं। जवाहर अश्वगंधा-20, जवाहर अश्वगंधा-134 और पूषिता इनमें प्रमुख हैं। ये किस्में रोगों से लड़ने में सक्षम हैं और बाज़ार में इनकी माँग भी अच्छी है। यहाँ एक टेबल में इनकी जानकारी दी गई है:
किस्म का नाम | तैयार होने का समय | पैदावार (क्विंटल/हेक्टेयर) | खासियत |
---|---|---|---|
जवाहर अश्वगंधा-20 | 150-180 दिन | 5-6 | उच्च गुणवत्ता |
जवाहर अश्वगंधा-134 | 160-180 दिन | 6-7 | रोग प्रतिरोधी |
पूषिता | 150-170 दिन | 5-6 | बाज़ार में माँग |
अपने क्षेत्र की जलवायु के हिसाब से सही किस्म चुनें।
खाद और सिंचाई का प्रबंधन
अश्वगंधा को ज्यादा खाद की ज़रूरत नहीं होती। पिछले फसल के अवशेष और गोबर की खाद से ही काम चल जाता है। अगर ज़रूरत हो, तो बुवाई के समय 20 किलो नाइट्रोजन और 40 किलो फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर डाल सकते हैं। सिंचाई की बात करें, तो ये फसल बारिश पर निर्भर रहती है। अगर बारिश समय पर न हो, तो 2-3 जीवन रक्षक सिंचाई करें। पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद और दूसरी 25-30 दिन बाद करें। ज्यादा पानी से बचें, वरना जड़ें खराब हो सकती हैं।
कीट और रोग से बचाव
अश्वगंधा पर कीट और रोगों का असर कम पड़ता है। फिर भी, कभी-कभी माहू कीट और पूर्ण झुलसा रोग परेशान कर सकते हैं। माहू से बचने के लिए मोनोक्रोटोफॉस (1 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। पूर्ण झुलसा रुग के लिए डायथेन एम-45 (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) का इस्तेमाल करें। बुवाई के 30 दिन बाद पहला छिड़काव करें और ज़रूरत हो तो 15 दिन बाद दोबारा करें। समय पर निगरानी से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है।
कटाई और मुनाफा
अश्वगंधा की फसल 5-6 महीने में तैयार हो जाती है। जब पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगें और जड़ें पूरी तरह विकसित हो जाएँ, तो कटाई शुरू करें। एक हेक्टेयर से 5-7 क्विंटल जड़ और 50 किलो बीज मिल सकते हैं। बाज़ार में जड़ का भाव 300-500 रुपये प्रति किलो और बीज का 100-150 रुपये प्रति किलो रहता है। इस हिसाब से एक हेक्टेयर से 1.5-2.5 लाख रुपये की कमाई हो सकती है। लागत करीब 30-40 हज़ार रुपये आती है, जिसके बाद शुद्ध मुनाफा 1-2 लाख रुपये तक हो सकता है। छोटे किसान आधा एकड़ में भी शुरू कर सकते हैं और 50-80 हज़ार रुपये कमा सकते हैं।
अश्वगंधा की खेती के फायदे
अश्वगंधा की खेती के कई फायदे हैं। ये कम लागत में ज्यादा मुनाफा देती है। इसकी माँग आयुर्वेदिक और हर्बल उद्योग में हमेशा बनी रहती है। ये फसल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है और अगली फसल के लिए खेत को तैयार करती है। साथ ही, इसे उगाने में मेहनत कम लगती है और प्राकृतिक जोखिम का खतरा भी कम होता है। सरकार की सब्सिडी और बढ़ती माँग इसे और आकर्षक बनाते हैं।
सावधानियाँ
अश्वगंधा की खेती करते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखें। जलभराव से जड़ें सड़ सकती हैं, इसलिए पानी का निकास अच्छा रखें। बीज की गुणवत्ता सही हो, वरना पैदावार कम होगी। कीट और रोगों की समय पर जाँच करें। सही समय पर कटाई न करने से जड़ों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
अश्वगंधा की खेती किसानों के लिए एक शानदार मौका है। कम लागत, कम मेहनत और अच्छे मुनाफे के साथ ये फसल आपको आर्थिक रूप से मज़बूत कर सकती है। सही तरीके और देखभाल से आप इसे आसानी से उगा सकते हैं। तो इस बार अश्वगंधा की खेती का प्लान बनाएँ और मोटी कमाई का फायदा उठाएँ। किसी सवाल के लिए अपने नज़दीकी कृषि केंद्र से सलाह लें।
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