यह मौसम मूली की खेती के लिए सही मेल बन रहा है। मूली, जो हर घर की थाली में स्वाद और सेहत लाती है, बरसात में अपने रंग-रूप से खेतों को सजाती है। प्राकृतिक खेती की सलाह के बाद, पूसा चेतकी, कृष्णा, और जापानी सफेद जैसी उत्तम किस्में किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई हैं। इनके बीज जुलाई से सितंबर तक बोए जा सकते हैं, और 40-55 दिनों में ये तैयार होकर मेज पर परोसने लायक हो जाती हैं। इनकी सफेद जड़ें, मुलायम रस, और उच्च पैदावार खेती को मुनाफे का जरिया बना सकती हैं। आइए, इन किस्मों की कहानी को अपने खेतों में बुनें और प्रकृति के साथ कदम मिलाएं।
पूसा चेतकी, हर मौसम का साथी
पूसा चेतकी मूली की वह किस्म है, जो गर्मी और बरसात दोनों में किसान का विश्वास जीतती है। जुलाई से सितंबर तक इसके बीज बोए जा सकते हैं, और 40-45 दिन में यह सफेद, लंबी, मुलायम जड़ों के साथ तैयार हो जाती है। इसकी खासियत यह है कि इसमें रेशे कम होते हैं, जो इसे खाने में और स्वादिष्ट बनाते हैं। बारिश की नमी इसे गले लगाती है, और मिट्टी में जड़ें मजबूती पकड़ लेती हैं।
इसे गमले में भी उगा सकते हैं, जहां यह छोटे बगीचों को भी हरा-भरा कर देती है। इसकी पैदावार प्रति एकड़ 150-200 क्विंटल तक हो सकती है, जो बाजार में 20-25 रुपये प्रति किलो की दर से अच्छा मुनाफा देती है। इसे उगाने के लिए हल्की जुताई और जैविक खाद का इस्तेमाल करें, और देखें कैसे यह आपके आँगन में मिठास बिखेरती है।
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कृष्णा, बरसात की योद्धा
कृष्णा मूली बरसात और गर्मी के लिए एक सच्ची योद्धा है, जो जलभराव को भी सहन कर लेती है। जुलाई-अगस्त में इसके बीज बोएं, और 45-50 दिन बाद यह मध्यम लंबाई की सफेद जड़ों के साथ तैयार हो जाती है। बारिश के दिनों में जब खेतों में पानी ठहर जाता है, यह किस्म डटकर खड़ी रहती है और अपनी मिठास को बरकरार रखती है। इसे उगाने के लिए अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी चुनें और हफ्ते में दो बार पानी दें।
इसकी पैदावार 120-180 क्विंटल प्रति एकड़ हो सकती है, जो ग्रामीण बाजार में 15-20 रुपये प्रति किलो की कीमत दिला सकती है। कृष्णा न सिर्फ स्वाद देती है, बल्कि पोषण से भरपूर होती है—इसके रस में विटामिन सी और फाइबर छिपे हैं, जो सेहत को नई ताकत देते हैं। इसे लगाएं और बारिश के साथ अपनी मेहनत को फलते देखें।
जापानी सफेद, व्यावसायिक सफलता का आधार
जापानी सफेद मूली का नाम सुनते ही व्यावसायिक किसानों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, क्योंकि यह लोकप्रियता और पैदावार दोनों में अव्वल है। जुलाई से सितंबर तक इसके बीज बोए जा सकते हैं, और 50-55 दिन में यह लंबे आकार की सफेद जड़ों के साथ तैयार हो जाती है। इसकी खासियत यह है कि यह प्रति एकड़ 200-250 क्विंटल तक पैदावार देती है, जो बाजार में 25-30 रुपये प्रति किलो की दर से अच्छा मुनाफा दे सकता है।
बारिश की नमी इसे और मजबूत बनाती है, लेकिन जलभराव से बचाने के लिए हल्की जुताई जरूरी है। इसे उगाने के लिए जैविक खाद और नियमित पानी दें, ताकि जड़ें गहरी और मजबूत हों। यह मूली न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट है, बल्कि सलाद और अचार के लिए भी मशहूर है। इसे लगाएं और अपने खेत को मुनाफे की फसल से सजाएं।
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खेती की कला, मूली को दें सही माहौल
मूली की इन किस्मों को उगाने के लिए मिट्टी का चुनाव अहम है। हल्की दोमट या रेतीली मिट्टी, जिसमें जल निकासी अच्छी हो, इनके लिए बेस्ट है। जुलाई-अगस्त में बीज 2-3 सेमी गहराई पर बोएं और पंक्तियों में 15-20 सेमी की दूरी रखें। बारिश के पानी को नियंत्रित करें, ताकि जड़ें सड़ न जाएं—हफ्ते में एक बार हल्की सिंचाई करें। जैविक खाद जैसे गोबर की सड़ी खाद या वर्मीकम्पोस्ट मिलाएं, जो मूली को रसीला बनाएगी। कीटों से बचाव के लिए नीम तेल का छिड़काव करें। 40-55 दिन बाद कुदाल से जड़ें निकालें, और ताजा मूली का स्वाद चखें। यह मेहनत आपके परिवार को सेहत और बाजार को मुनाफा देगी।
बरसात की इस रात में मूली की खेती शुरू करें और अपने खेत को हरा-भरा बनाएं। पूसा चेतकी, कृष्णा, और जापानी सफेद इन तीनों को अपनाएं, और देखें कैसे ये आपके आँगन में मिठास और समृद्धि लाती हैं। यह वक्त प्रकृति के साथ हाथ मिलाने का है—जैविक तरीके अपनाएं, मिट्टी को प्यार दें, और फसल को नई ऊंचाई पर ले जाएं। अगले साल इस वक्त आप अपनी मेहनत का फल बेचकर मुस्कुराएंगे। गांव-गांव में यह संदेश फैलाएं, और मूली की खेती से नई क्रांति की नींव डालें।
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