अब गाय को नहीं होगा दर्द, न गिरेगा दूध! किसान ने देसी दिमाग से बना दी कमाल की मशीन

भारत में पशुपालन करने वाले छोटे किसानों के लिए दूध निकालना एक बड़ी चुनौती रहता है। बाजार में उपलब्ध ज्यादातर मिल्किंग मशीनें विदेशी नस्लों जैसे होल्स्टीन फ्रीजियन या जर्सी गायों के लिए डिजाइन की गई हैं, जिनके थन बड़े और मजबूत होते हैं। लेकिन देसी नस्लों जैसे साहिवाल, गिर, लखीमी या अन्य छोटी गायों के थन छोटे और नाजुक होते हैं।

इन मशीनों से दूध निकालने में गाय को दर्द होता है, दूध की बर्बादी होती है और कभी-कभी गाय चिढ़कर दूध देना भी कम कर देती है। इन सब समस्याओं का आसान और सस्ता हल निकाला है असम के कामरूप जिले के एक साधारण किसान मिलन ज्योति दास ने। उन्होंने अपनी देसी सोच से ऐसी मिल्किंग मशीन बनाई जो पूरी तरह देसी गायों के लिए फिट बैठती है।

मिलन ज्योति दास बताते हैं कि उन्होंने गायों की शारीरिक बनावट को ध्यान में रखकर मशीन का टीट कप (थन कप) डिजाइन किया। कप का घेरा 3 से 5 सेंटीमीटर और लंबाई 11 से 13 सेंटीमीटर रखी है, जो छोटे थनों पर बिल्कुल फिट हो जाता है। इससे वैक्यूम प्रेशर सही रहता है और दूध की एक बूंद भी बर्बाद नहीं होती। मशीन में छोटा वैक्यूम पंप और 0.75 से 1 HP की मोटर लगी है, जो घरेलू 220 वोल्ट बिजली पर चलती है। सिंगल या डबल बाल्टी का विकल्प है और ये हल्की व पोर्टेबल है, कहीं भी ले जाई जा सकती है। एक घंटे में 8 से 10 गायों का दूध आसानी से निकल जाता है।

सिर्फ 3000 रुपये की लागत

इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है – सिर्फ 3000 रुपये में बन जाती है। ये कीमत छोटे पशुपालकों की जेब पर बोझ नहीं डालती। पारंपरिक तरीके से हाथ से दूध निकालने में समय लगता है और मजदूर रखने पड़ते हैं, जबकि ये मशीन समय बचाती है, मजदूरों पर निर्भरता कम करती है और दूध की स्वच्छता भी बनाए रखती है। गाय को कोई दर्द या बेचैनी नहीं होती, इसलिए वो आराम से दूध देती रहती है और उत्पादन भी बढ़ता है।

देसी नस्लों के लिए क्यों परफेक्ट

साहिवाल, गिर, लखीमी जैसी देसी नस्लों के थन छोटे होते हैं, इसलिए विदेशी मशीनें फिट नहीं बैठतीं। लेकिन मिलन ज्योति दास की ये देशी मशीन इन नस्लों के लिए खासतौर पर बनाई गई है। इससे दूध की बर्बादी रुकती है, गाय खुश रहती है और किसान का मुनाफा बढ़ता है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में जहां छोटी नस्लें ज्यादा हैं, ये मशीन गेम-चेंजर साबित हो सकती है। प्राकृतिक खेती करने वाले किसान भी इसे पसंद करेंगे, क्योंकि ये केमिकल या ज्यादा बिजली पर निर्भर नहीं है।

किसान भाइयों, अगर आप देसी गायें पालते हैं तो इस तरह की सस्ती और सरल मशीन आजमाएं। मिलन ज्योति दास जैसे इनोवेटिव किसानों की सोच साबित करती है कि बड़े बदलाव छोटे जुगाड़ से भी आ सकते हैं। अपने इलाके के कृषि केंद्र या पशुपालन विभाग से ऐसी मशीनों की जानकारी लें।

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