5000 साल पुरानी औषधि या सिर्फ मसाला? जानिए धनिया की असली पहचान

धनिया पत्ता, जिसे हम हर दिन अपनी थाली में हरा-भरा देखते हैं, सिर्फ एक मसाला नहीं, बल्कि एक ऐसी जड़ी-बूटी है जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है। इसकी ताजगी भरी खुशबू और स्वाद से खाना और भी लाजवाब लगता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि इसकी खोज कैसे हुई, लोग इसे कब से इस्तेमाल कर रहे हैं, और भारत में यह कब और कैसे आया? आज हम धनिया पत्ते की इस रोमांचक यात्रा को जानेंगे, जो प्राचीन समय से लेकर आज की मॉडर्न किचन तक फैली है। यह कहानी न सिर्फ खाने का जायका बढ़ाती है, बल्कि सेहत के लिए भी कमाल की चीजों से भरी है।

धनिया की खोज की शुरुआत

धनिया की जड़ें बहुत पुरानी हैं, और इसका इतिहास मिट्टी की गहराइयों में छिपा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि धनिया की खोज करीब 5000 साल पहले मध्य पूर्व में हुई। उस वक्त लोग जंगली पौधों को इकट्ठा करते थे और उनकी खासियतें जानने की कोशिश करते थे। धनिया का पौधा पहली बार फारस और मेसोपोटामिया के इलाकों में पाया गया, जहां इसके बीज और पत्तों को खाने और दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा।

कहते हैं कि प्राचीन लोग इसके बीजों को पीसकर मसाले बनाते थे और पत्तों को सलाद में डालते थे। धीरे-धीरे यह पौधा अपने औषधीय गुणों के लिए मशहूर हो गया, क्योंकि इसमें विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स की भरमार होती है।

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कब से हो रहा है इस्तेमाल

धनिया का इस्तेमाल हजारों साल से दुनिया भर में हो रहा है। मिस्र में तो इसके बीजों को 2000 ईसा पूर्व के ममीकरण में भी इस्तेमाल किया गया था, ताकि मृतकों को सुरक्षित रखा जा सके। ग्रीक और रोमन लोग इसे मसाले के साथ-साथ दवा के तौर पर भी लेते थे, खासकर पेट की परेशानियों को ठीक करने के लिए। भारत में भी धनिया का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन यह यहां सीधे जंगली रूप में नहीं आया। पुराने ग्रंथों में इसका जिक्र नहीं मिलता, लेकिन इसके बीजों का इस्तेमाल आयुर्वेद में शुरुआती दौर से ही देखा गया है।

भारत में धनिया का आगमन

धनिया भारत में व्यापार के रास्तों के जरिए आया, और इसका सफर बहुत रोचक है। इतिहासकारों का मानना है कि यह पौधा करीब 2000 साल पहले मध्य पूर्व और भूमध्यसागरीय देशों से भारत पहुंचा। उस वक्त व्यापारी मसालों, जड़ी-बूटियों, और अनाज का लेन-देन करते थे, और धनिया भी इनके साथ भारत की मिट्टी में जड़ें जमा लिया। खास तौर पर गुजरात और राजस्थान जैसे इलाकों में इसका बोया जाने लगा, क्योंकि यहां का मौसम इसकी खेती के लिए मुफीद था। अरब और फारसी व्यापारियों ने इसे भारतीय रसोई में लाकर हरी चटनी और सब्जियों में डालने का चलन शुरू किया। धीरे-धीरे यह हर घर की जरूरत बन गया।

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खेती और इस्तेमाल का तरीका

भारत में धनिया की खेती आज भी आसान और फायदेमंद है। इसे ठंडी और नम मिट्टी में बोया जाता है, और सर्दियों का मौसम इसके लिए बेस्ट है। किसान इसे बीज से उगाते हैं और 30-40 दिन में हरा-हरा धनिया तैयार हो जाता है। इसके पत्तों को काटकर चटनी, सलाद, और सब्जियों में डाला जाता है, जबकि बीजों को सुखाकर मसाले बनाए जाते हैं। देसी खाना जैसे दाल, करी, और बिरयानी में धनिया की खुशबू बिना नहीं चलती। इसके अलावा, इसका इस्तेमाल आयुर्वेद में स्किन की देखभाल और सिरदर्द दूर करने के लिए भी होता है। प्रति एकड़ खेती से 2-3 क्विंटल हरा धनिया मिलता है।

सेहत और संस्कृति में योगदान

धनिया पत्ता सिर्फ स्वाद ही नहीं, सेहत का खजाना भी है। इसमें विटामिन सी और आयरन की अच्छी मात्रा होती है, जो इम्यूनिटी बढ़ाती है और खून की कमी दूर करती है। देसी घरों में इसे पानी में उबालकर पीने से पेट साफ रहता है और गर्मी में ठंडक मिलती है। सांस्कृतिक रूप से, धनिया भारतीय खानपान का हिस्सा बन चुका है। शादियों से लेकर त्योहारों तक, हर खास मौके पर इसकी चटनी और सजावट देखने को मिलती है। यह न सिर्फ खाने का जायका बढ़ाता है, बल्कि परंपरा को भी जिंदा रखता है।

धनिया की मांग दिन-ब-दिन बढ़ रही है, और अब इसे ऑर्गेनिक तरीके से उगाने का चलन भी शुरू हो गया है। किसान इसे बाजार के साथ-साथ घरों में भी उगा रहे हैं, ताकि ताजा धनिया हमेशा उपलब्ध रहे। आने वाले समय में इसके निर्यात की संभावना भी बढ़ रही है, जो किसानों की आमदनी को और मजबूत करेगी।

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  • Dharmendra

    मै धर्मेन्द्र एक कृषि विशेषज्ञ हूं जिसे खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी साझा करना और नई-नई तकनीकों को समझना बेहद पसंद है। कृषि से संबंधित लेख पढ़ना और लिखना मेरा जुनून है। मेरा उद्देश्य है कि किसानों तक सही और उपयोगी जानकारी पहुंचे ताकि वे अधिक उत्पादन कर सकें और खेती को एक लाभकारी व्यवसाय बना सकें।

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