गेहूँ की बंपर पैदावार का राज़ – झंडा पत्ती को ऐसे रखें 100% स्वस्थ

Updated: 04 Dec 2025, 08:14 AM

हर किसान भाई की यही मनोकामना होती है कि खेत में गेहूँ की बालियाँ लहराएँ, हर बाली लंबी और भारी हो, दाने मोटे-चमकदार हों और एक एकड़ से 20-22 क्विंटल तक शानदार उत्पादन मिले। इसके लिए किसान शुरू से ही पूरी मेहनत करता है अच्छा बीज, समय पर बुवाई, खाद- पानी सब कुछ। लेकिन फसल जब बाली मारने की तैयारी करती है, उस समय एक छोटी-सी बात सारी मेहनत का फल तय कर देती है गेहूँ की सबसे ऊपरी पत्ती, जिसे झंडा पत्ती कहते हैं।

झंडा पत्ती असल में फसल की फैक्ट्री है

जब गेहूँ का पौधा बाली निकालने की तैयारी करता है, तब सबसे ऊपर एक चौड़ी, लंबी और गहरे हरे रंग की पत्ती निकलती है। यही झंडा पत्ती होती है। कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि पूरी फसल में होने वाला 70 से 80 प्रतिशत फोटोसिंथेसिस इसी एक पत्ती से होता है। यही सूरज की रोशनी को सोखकर कार्बोहाइड्रेट बनाती है और यही खुराक बालियों तक पहुँचाती है। अगर यह पत्ती पूरी तरह स्वस्थ, चौड़ी और हरी-भरी रही तो बालियों में नीचे से ऊपर तक हर दाना अच्छी तरह भरेगा, उसका वजन बढ़ेगा और चमक भी आएगी। लेकिन अगर यह पत्ती पीली पड़ गई, सूख गई या रोगग्रस्त हो गई तो बालियाँ तो दिखेंगी, पर अंदर दाने खाली या चपटे रह जाएँगे।

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फरवरी-मार्च में सबसे ज्यादा खतरा

रबी मौसम चल रहा है। फरवरी के पहले-दूसरे सप्ताह में ज्यादातर खेतों में झंडा पत्ती पूरी तरह खुल चुकी होती है। इसी समय दो बड़े खतरे सामने आते हैं एक तो पोषक तत्वों की कमी, दूसरा रतुआ रोग का हमला। इन दोनों से झंडा पत्ती सबसे पहले प्रभावित होती है। अगर इन्हें समय रहते नहीं रोका गया तो मार्च में दाना बनने की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था (मिल्क स्टेज और डो स्टेज) में पौधे को खुराक ही नहीं मिलेगी और पैदावार 30-40 प्रतिशत तक कम हो सकती है।

रतुआ रोग

रतुआ तीन तरह का होता है पीला रतुआ, भूरा रतुआ और काला रतुआ। इस मौसम में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में पीला और भूरा रतुआ का प्रकोप दिख रहा है। यह रोग सबसे पहले झंडा पत्ती पर छोटे-छोटे नारंगी या भूरे धब्बे बनाता है। कुछ ही दिनों में पूरी पत्ती सूख जाती है और फोटोसिंथेसिस बंद हो जाता है। नतीजा बालियाँ छोटी रह जाती हैं और दाने सिकुड़ जाते हैं।

अभी करें ये चार जरूरी काम

पहला – रतुआ रोकने के लिए तुरंत छिड़काव जैसे ही झंडा पत्ती पूरी तरह खुल जाए या उस पर हल्के धब्बे दिखें, प्रोपिकोनाजोल 25% ईसी 200 मिलीलीटर या टेबुकोनाजोल 50% डब्ल्यूजी 200 ग्राम या ट्राइएडिमेफॉन 250 ग्राम प्रति एकड़ 200-250 लीटर पानी में घोलकर अच्छी तरह छिड़काव करें। यह दवा न सिर्फ रतुआ को पूरी तरह नियंत्रित करती है, बल्कि फाइटोटॉनिक का काम भी करती है पत्तियाँ चौड़ी और चमकदार हो जाती हैं, जिससे दाने मोटे और भारी भरते हैं। 10-12 दिन बाद जरूरत पड़े तो दूसरा छिड़काव दोहरा दें।

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दूसरा – संतुलित पोषक तत्वों का स्प्रे झंडा पत्ती के खुलते ही एनपीके 19:19:19 या 00:52:34 या 00:00:50 में से किसी एक का 2 किलोग्राम + जिंक सल्फेट 33% 1 किलोग्राम + घुलनशील बोरॉन 20% 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर छिड़काव करें। यह स्प्रे 8-10 दिन के अंतर पर दो बार करें। इससे पत्तियाँ लंबे समय तक हरी और स्वस्थ रहेंगी, दाने का भराव शानदार होगा और चमक भी बढ़ेगी।

तीसरा – मिल्क और डो स्टेज पर पानी का पूरा ध्यान मार्च के पहले और दूसरे सप्ताह में जब बालियों में दूध जैसा रस भरा होता है (मिल्क स्टेज) और फिर गाढ़ा होने लगता है (डो स्टेज), उस समय पानी की कमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। इस अवस्था में एक भी दिन सूखा रहा तो दाने सिकुड़ जाएँगे और पैदावार 5-7 क्विंटल प्रति एकड़ तक कम हो सकती है। हल्की-हल्की दो सिंचाई अवश्य करें।

चौथा – अतिरिक्त टॉनिक से निखार अगर आप फसल को और बेहतर बनाना चाहते हैं तो 500 ग्राम अच्छी क्वालिटी का अमीनो एसिड 500 मिलीलीटर सीवीड एक्सट्रैक्ट या ह्यूमिक एसिड प्रति एकड़ छिड़काव करें। यह खर्च 700-800 रुपये प्रति एकड़ आता है, लेकिन दानों की चमक, वजन और बाजार भाव में 1.5-2 क्विंटल का फर्क साफ दिखता है।

पहले ही बचाव शुरू करें

बुवाई से पहले बीज को कार्बेंडाजिम और मैंकोजेब या टेबुकोनाजोल से जरूर उपचारित करें। रतुआ-प्रतिरोधी किस्में जैसे HD-2967, HD-3086, PBW-343, WH-1105 आदि चुनें। खेत की गहरी जुताई करें ताकि पुराने रोग मिट्टी में दब जाएँ।

फरवरी-मार्च का समय आपकी फसल की किस्मत लिखने वाला समय है। झंडा पत्ती को पूरी तरह स्वस्थ और हरा-भरा रखने में जितना ध्यान देंगे, अप्रैल में कटाई के समय उतना ही शानदार परिणाम मिलेगा। थोड़ी-सी सावधानी और समय पर किए गए उपाय आपकी फसल को सचमुच बंपर बना सकते हैं। अभी से शुरू करें आपकी मेहनत रंग लाएगी।

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