Goat Farming: हमारे गाँवों में बकरी पालन सालों से आजीविका का मजबूत आधार रहा है। यह छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए कमाई का बड़ा जरिया है। लेकिन बकरियों का वजन बढ़ाने के लिए महंगे चारे और लंबे समय की जरूरत पशुपालकों के लिए चुनौती थी। अब मथुरा के केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (CIRG) ने एक नई देसी तकनीक विकसित की है, जो सस्ते और स्थानीय संसाधनों से बकरियों का वजन और सेहत बढ़ाएगी। यह तकनीक गाँव के पशुपालकों के लिए कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाने का सुनहरा मौका है।
CIRG की नई देसी तकनीक
मथुरा का CIRG, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत काम करने वाला एक प्रमुख संस्थान है। इसकी नई खोज में देसी खुराक, सही नस्ल चयन, और बेहतर प्रबंधन पर जोर दिया गया है। इस तकनीक में महंगे सप्लीमेंट्स की जरूरत नहीं पड़ती। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हरा चारा, सूखा भूसा, और अनाज को संतुलित कर एक ऐसी खुराक तैयार की गई है, जो बकरियों को तंदुरुस्त बनाती है। यह तकनीक ग्रामीण भारत के लिए सस्ती और टिकाऊ है, जिससे पशुपालक कम खर्च में ज्यादा कमाई कर सकते हैं।
पहले बकरी पालन में कई दिक्कतें थीं। वजन बढ़ाने के लिए महंगा प्रोटीन युक्त दाना या खनिज मिश्रण खरीदना पड़ता था, जो छोटे पशुपालकों के लिए मुश्किल था। कई बार बकरियाँ महीनों बाद भी बाजार के लिए तैयार नहीं होती थीं। ज्यादा चारा देने से पाचन की समस्याएँ भी हो जाती थीं। CIRG की नई तकनीक इन सभी परेशानियों को दूर करती है। यह देसी संसाधनों का इस्तेमाल करती है, जिससे लागत कम रहती है और बकरियों की सेहत भी सुधरती है।
देसी खुराक की ताकत
CIRG की इस तकनीक का आधार स्थानीय संसाधनों से बनी खुराक है। इसमें हरा चारा, जैसे बरसीम और लूसर्न, सूखा भूसा, और मक्का या जौ जैसे अनाज शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, और खनिजों का सही अनुपात सुनिश्चित किया है। यह खुराक बकरियों का वजन तेजी से बढ़ाती है और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करती है। गाँव में आसानी से उपलब्ध सामग्री होने से पशुपालकों का खर्च कम होता है।
सही नस्ल और प्रबंधन
इस तकनीक में नस्ल चयन बहुत जरूरी है। CIRG ने बारबरी, सिरोही, और जमुनापारी जैसी नस्लों पर फोकस किया है, जो भारतीय मौसम में अच्छी तरह पनपती हैं और तेजी से वजन बढ़ाती हैं। इन नस्लों को देसी खुराक के साथ पालने पर 20-30% तेजी से वजन बढ़ता है। साथ ही, साफ और हवादार शेड, गर्मी-सर्दी से बचाव, और समय पर टीकाकरण जैसे आसान प्रबंधन के तरीके बताए गए हैं। इससे बकरियाँ कम बीमार पड़ती हैं और उनका विकास बेहतर होता है।
पशुपालकों के लिए फायदे
यह तकनीक पशुपालकों के लिए कई फायदे लाती है। देसी खुराक से लागत कम होती है, और बकरियाँ 3-4 महीने में बाजार के लिए तैयार हो जाती हैं। इससे मीट का उत्पादन बढ़ता है और बाजार में अच्छा दाम मिलता है। बकरियों की सेहत सुधरने से दवाओं का खर्च भी कम होता है। ग्रामीण बाजारों में स्वस्थ और मोटी बकरियों की मांग ज्यादा है, जिससे आय बढ़ती है। यह तकनीक छोटे और बड़े दोनों पशुपालकों के लिए उपयोगी है।
भारतीय नवाचार की मिसाल
दुनिया में बकरी पालन को बेहतर बनाने के लिए कई देश आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन CIRG ने देसी संसाधनों को ध्यान में रखकर यह तकनीक बनाई है। यह सस्ती और ग्रामीण पशुपालकों के लिए आसानी से लागू होने वाली है। यह भारतीय नवाचार का शानदार उदाहरण है, जो वैश्विक स्तर पर भी ध्यान खींच रहा है।
छोटे पशुपालकों के लिए मौका
छोटे पशुपालकों के लिए यह तकनीक वरदान है। गाँव में 5-10 बकरियों के साथ पालन शुरू करने की लागत 50,000-70,000 रुपये हो सकती है, और 6-8 महीने में 1-1.5 लाख रुपये की आय हो सकती है। यह तकनीक ग्रामीण युवाओं को बकरी पालन की ओर आकर्षित कर रही है।
आगे का रास्ता
CIRG की यह तकनीक बकरी पालन को नई दिशा देगी। भारत में बकरी के मांस की मांग तेजी से बढ़ रही है, और यह तकनीक मीट उत्पादन बढ़ाकर गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। यह जैविक और टिकाऊ पशुपालन को भी बढ़ावा देती है। भविष्य में यह तकनीक भेड़ पालन के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
पशुपालकों के लिए सुझाव
इस तकनीक का लाभ उठाने के लिए CIRG की वेबसाइट पर अपडेट्स देखें। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या CIRG के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लें। बकरियों के लिए साफ और छायादार शेड बनाएँ। देसी खुराक को संतुलित करें और समय पर चारा-पानी दें। राष्ट्रीय पशुधन मिशन जैसी सरकारी योजनाओं से सब्सिडी लें। इन कदमों से आप अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं।
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