किसान भाइयों, आज हम बात करेंगे जूट की खेती की, जिसे “सनाल सोना” भी कहते हैं। जूट एक रेशेदार फसल है, जिससे बोरे, रस्सी, और कपड़े बनते हैं। भारत में पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, और ओडिशा इसके लिए मशहूर हैं। ये गर्म और नम मौसम में उगती है और बाज़ार में अच्छी कमाई देती है। जूट की खेती से मिट्टी की ताकत भी बढ़ती है। गाँव में इसे देसी तरीके से उगाकर आप फायदा उठा सकते हैं। आइए जानते हैं कि जूट की खेती कैसे करें।
जूट को समझें
जूट का पौधा 8-12 फीट तक बढ़ता है। इसके तने से रेशे निकाले जाते हैं, जो मजबूत और टिकाऊ होते हैं। ये खरीफ की फसल है, जो 120-150 दिन में तैयार होती है। दो मुख्य किस्में हैं – कैप्सुलेरिस (सफेद जूट) और ओलिटोरियस (टोसा जूट)। इसे 25-35°C तापमान और बारिश (100-150 सेमी) चाहिए। एक हेक्टेयर से 20-25 क्विंटल रेशे मिल सकते हैं। गाँव में इसे नम मिट्टी वाले खेतों में आसानी से उगाया जा सकता है।
खेत तैयार करने का तरीका
जूट के लिए दोमट या बलुई मिट्टी बढ़िया है, जिसमें पानी रुकने की ताकत हो। खेत को 2-3 बार हल से जोतें और मिट्टी को भुरभुरा करें। प्रति हेक्टेयर 5-7 टन गोबर की खाद डालें। अगर मिट्टी में जलभराव हो, तो नालियाँ बनाएँ, लेकिन नमी बनी रहे। pH 5.5-7 के बीच रखें। मार्च-अप्रैल में खेत तैयार करें, ताकि मई-जून में बुवाई हो सके। बारिश से पहले मिट्टी में नमी होने से फसल अच्छी शुरू होती है। खरपतवार हटाने के लिए पाटा चलाएँ।
बुवाई का सही समय और तरीका
जूट की बुवाई मई से जून में करें, जब बारिश शुरू हो। प्रति हेक्टेयर 6-8 किलो बीज (कैप्सुलेरिस) या 4-6 किलो (ओलिटोरियस) चाहिए। बीज को 24 घंटे पानी में भिगो दें, ताकि अंकुरण तेज हो। कतार से कतार 25-30 सेमी और पौधे से पौधे 10 सेमी की दूरी रखें। बीज को 2-3 सेमी गहरा बोएं। हल्का पानी छिड़कें और 5-7 दिन में अंकुर निकल आएँगे। अगर बारिश न हो, तो एक हल्की सिंचाई करें। बुवाई के लिए बैल या ट्रैक्टर से लाइन बना सकते हैं।
बीज कहाँ से लें
जूट के बीज नजदीकी कृषि केंद्र, बीज भंडार, या नर्सरी से मिलते हैं। ‘JRO-524’, ‘JRO-8432’ (टोसा), या ‘JRC-321’ (सफेद) अच्छी किस्में हैं। ये 50-100 रुपये किलो मिलते हैं। सरकारी केंद्र से सस्ते में ले सकते हैं। ऑनलाइन इंडिया मार्ट या कृषि स्टोर से भी ऑर्डर कर सकते हैं। बीज लेते वक्त देखें कि वो स्वस्थ और प्रमाणित हों। गाँव में किसी पुराने किसान से भी बीज माँग सकते हैं।
पानी और खाद का इंतजाम
जूट को नमी बहुत चाहिए। बुवाई के बाद अगर बारिश न हो, तो 10-15 दिन में एक बार सिंचाई करें। प्रति हेक्टेयर 40 किलो नाइट्रोजन, 20 किलो फॉस्फोरस, और 20 किलो पोटाश डालें। आधा नाइट्रोजन बुवाई के समय और आधा 30 दिन बाद दें। गोबर की खाद पहले ही डाल दी जाती है। ज्यादा पानी से बचें, वरना जड़ें सड़ सकती हैं। बारिश वाले इलाकों में अतिरिक्त पानी की जरूरत नहीं। खेत में नमी बनाए रखने के लिए पुआल डाल सकते हैं।
देखभाल और कीटों से बचाव
जूट में खरपतवार शुरू में परेशान करते हैं। बुवाई के 20-30 दिन बाद हल्की गुड़ाई करें। कीट जैसे तना भेदक या जूट माइट लगें, तो नीम का तेल (5 मिली प्रति लीटर पानी) छिड़कें। फफूंद से बचने के लिए बुवाई से पहले बीज को थाइरम (3 ग्राम प्रति किलो) से उपचारित करें। पौधों को हवा मिले, इसके लिए भीड़ न होने दें। गर्मी और नमी में फसल को ध्यान से देखें।
कटाई और मुनाफे
जूट 120-150 दिन में तैयार होता है। जब पत्तियाँ पीली पड़ें और फल बन जाएँ, तो पौधे काट लें। कटाई के बाद तनों को 15-20 दिन पानी में डुबोएँ (रेटिंग), फिर रेशे निकालें और धूप में सुखाएँ। प्रति हेक्टेयर 20-25 क्विंटल रेशे मिलते हैं। लागत 15,000-20,000 रुपये (बीज, खाद, मजदूरी) आती है। बाज़ार में 2000-3000 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है, यानी 40,000-75,000 रुपये की कमाई। बचे हुए तने ईंधन के काम आते हैं।
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