Animal Husbandry Tips: हमारे पशुपालक भाइयों, पशुपालन एक ऐसा धंधा है, जो मेहनत को सोने में बदल देता है। गाय-भैंस के दूध से लाखों रुपये की कमाई हो सकती है, लेकिन ये सब तब मुमकिन है, जब हमारे पशु तंदुरुस्त रहें। अगर पशुओं को कोई बीमारी लग जाए, खासकर टी.बी. जैसी, तो दूध का उत्पादन घट जाता है, और मेहनत पर पानी फिर जाता है। बोटाद के पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीपक चौहान जी ने इस बीमारी के लक्षण और इलाज की पूरी बात बताई है। तो आइए, समझते हैं कि पशुओं को टी.बी. से कैसे बचाएँ और अपने धंधे को चमकाएँ।
पशुपालन का पूरा खेल दूध पर टिका है। लोग दूध बेचकर, दही-घी बनाकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं। लेकिन पशु बीमार पड़े, तो दूध की धार पतली हो जाती है। इंसानों की तरह पशुओं में भी टी.बी. नाम की बीमारी होती है, जो उनकी सेहत को खराब कर देती है। इस बीमारी से निपटने के लिए सही जानकारी और इलाज जरूरी है। अगर पशुओं का ध्यान रखें, तो ये धंधा सालों तक मालामाल कर सकता है। डॉ. चौहान जी कहते हैं कि बीमारी को हल्के में न लें, वरना नुकसान बढ़ेगा।
पशुओं में टी.बी. क्या है?
डॉ. दीपक चौहान ने बताया, “जैसे इंसानों को बीमारियाँ होती हैं, वैसे ही पशुओं को भी कई रोग लगते हैं। इनमें से एक है टी.बी., जो माइक्रोबैक्टीरियम बोविस नाम के जीवाणु से फैलती है। ये बीमारी पशुओं की सेहत पर बुरा असर डालती है, और इसका सीधा नुकसान दूध उत्पादन पर पड़ता है। अगर वक्त रहते इसे काबू न किया जाए, तो पशु कमजोर हो जाता है, और धंधे को चोट पहुँचती है।” इस बीमारी के लक्षणों को पहचानना और इलाज शुरू करना बहुत जरूरी है।
टी.बी. का असर पशु के शरीर पर साफ दिखता है। सांस फूलना, बार-बार खाँसी आना, शरीर सूखना और वजन कम होना इसके बड़े लक्षण हैं। ये बीमारी कफ के जरिए भी फैलती है, यानी एक पशु से दूसरे तक आसानी से पहुँच सकती है। डॉ. चौहान कहते हैं, “पशु में कोई भी बदलाव दिखे, तो फटाफट पशु डॉक्टर से सलाह लें। बिना सलाह के घरेलू इलाज या दवा शुरू न करें, वरना हालत और बिगड़ सकती है।” सही वक्त पर कदम उठाएँ, तो नुकसान कम होगा।
टी.बी. का इलाज कैसे करें?
पशुओं में टी.बी. का इलाज इसके लक्षणों को देखकर शुरू होता है। डॉ. चौहान बताते हैं, “सबसे पहले पशु के लक्षणों को गौर से देखें – सांस की तकलीफ, खाँसी, या वजन घटना। फिर नजदीकी पशु अस्पताल में जाकर लैब में जाँच करवाएँ। ये जाँच बताएगी कि बीमारी टी.बी. है या कुछ और। इसके बाद ही इलाज शुरू करें।” लैब टेस्ट से पक्का पता चलता है, और फिर दवा या देखभाल के तरीके तय होते हैं। इलाज में देरी न करें, वरना पशु की हालत बिगड़ सकती है।
अगर पशु को टी.बी. हो जाए, तो उसे बाकी पशुओं से अलग रखें। ये बीमारी हवा और कफ से फैलती है, तो बाकी गाय-भैंस को बचाना जरूरी है। प्रभावित पशु को साफ जगह पर रखें, और उसके खाने-पीने का खास ध्यान दें। डॉक्टर की सलाह से दवा दें, और हालत पर नजर रखें। डॉ. चौहान जी कहते हैं, “टी.बी. का इलाज मुमकिन है, लेकिन सही जाँच और सावधानी बहुत जरूरी है। पशु अस्पताल से संपर्क करें, ताकि बीमारी को जड़ से काबू किया जा सके।”
पशुपालन को बनाएँ फायदेमंद
पशुपालन में सेहत का ध्यान रखना सबसे बड़ी बात है। अगर पशु तंदुरुस्त रहेंगे, तो दूध की धार चलती रहेगी, और आपकी जेब भरेगी। टी.बी. जैसी बीमारी से बचने के लिए पशुओं को साफ-सुथरा रखें। गोशाला में हवा का आना-जाना ठीक रखें, और समय-समय पर पशु डॉक्टर से जाँच करवाएँ। बीमारी का शक हो, तो तुरंत कदम उठाएँ। अलग रखने से बाकी पशु सुरक्षित रहेंगे, और नुकसान कम होगा।
डॉ. चौहान का कहना है, “पशुपालन मेहनत माँगता है, लेकिन ये फायदे का सौदा है। बीमारी पर नजर रखें, और सही इलाज करें। पशु डॉक्टर आपके साथी हैं, उनकी सलाह से हर मुश्किल आसान हो जाती है।” तो भाइयों, अपने पशुओं को परिवार की तरह देखभाल दें। ये धंधा न सिर्फ आपको मालामाल करेगा, बल्कि गाँव की तरक्की में भी मदद करेगा।
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