महाराष्ट्र में तूर की फसल पर बाढ़ की मार, 40% नुकसान से बढ़ेगी दाल की कीमतें

इस साल महाराष्ट्र के धरती पर जो बारिश हुई, वो किसानों के लिए वरदान कम, अभिशाप ज्यादा साबित हुई। खासकर तूर यानी अरहर की फसल पर इसका असर सबसे भयानक पड़ा है। लगातार मूसलाधार बारिश और बाढ़ ने खेतों को जलमग्न कर दिया, जिससे करीब 40 फीसदी तूर फसल तबाह हो गई। अहिल्यानगर, सांगली, सतारा, पुणे, बीड, सोलापुर, लातूर जैसे जिलों में तो हालात सबसे खराब हैं।

मराठवाड़ा के कई इलाकों में अभी भी खेतों में पानी भरा पड़ा है, और पौधे मुरझाने लगे हैं। लेकिन चिंता की बात यह नहीं कि सरकार और व्यापारी अफ्रीकी देशों से सस्ते आयात की राह पकड़ चुके हैं, ताकि बाजार में दाल की कमी न हो और उपभोक्ता महंगे दामों का शिकार न बने।

तूर उत्पादन का केंद्र बना महाराष्ट्र, लेकिन मौसम ने खेल बिगाड़ दिया

देश में तूर की खेती आठ राज्यों में फैली है, लेकिन महाराष्ट्र का नाम सबसे ऊपर आता है। पिछले साल 2024-25 में पूरे भारत ने 35.61 लाख टन तूर पैदा किया, जिसमें से 13.25 लाख टन यहीं से आया। इस बार बुवाई का रकबा भी 11.60 लाख हेक्टेयर रहा, जो उम्मीद जगाता था। लेकिन सितंबर-अक्टूबर की अतिवृष्टि ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया।

जिले के कृषि अधिकारी शिवसंब लाडके जैसे अफसर बताते हैं कि कई खेतों में पानी का स्टैंडिंग वाटर अभी भी बना हुआ है। बारिश थमने के बाद भी फसलें सुस्त पड़ी हैं, और किसान चिंतित हैं कि क्या बची-खुची फसल भी बच पाएगी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे राज्य में 68 लाख हेक्टेयर से ज्यादा फसलें प्रभावित हुई हैं, जिसमें तूर का बड़ा हिस्सा है।

फफूंदी रोग ने बढ़ाई मुसीबत

बारिश ने तो फसलें डुबो दीं ही, ऊपर से फ्यूजेरियम विल्ट नाम की फफूंदी ने जड़ें काटनी शुरू कर दीं। यह रोग पौधों की जड़ों में घुसकर पानी और पोषक तत्वों का रास्ता रोक देता है, जिससे पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है। कृषि विशेषज्ञ दीपक चव्हाण का अनुमान है कि 25 से 30 फीसदी तूर फसल इसी रोग की चपेट में है। यह नुकसान बाढ़ के अतिरिक्त है, यानी कुल मिलाकर फसल का बड़ा हिस्सा खतरे में पड़ गया।

किसान राजेश कुटे जैसे भाई बताते हैं कि फूल झड़ना और फलियां काली पड़ना आम हो गया है। नमी ज्यादा होने से वृद्धि रुक गई, और प्रति हेक्टेयर उपज में चार-पांच क्विंटल की कमी आ सकती है। अब मिट्टी सूख रही है, तो कीटों का हमला भी बढ़ रहा है, जो बची फसल को और नुकसान पहुंचा सकता है।

ये भी पढ़ें- धान की फसल के बाद करें खेसारी की खेती, सिर्फ कुछ हफ्तों में कमाएँ ₹15,000 प्रति एकड़

बाजार पर असर की आशंका, लेकिन आयात बनेगा सहारा

तूर का उत्पादन घटने से दाल के बाजार में हलचल मचने की पूरी संभावना है। महाराष्ट्र जैसे बड़े उत्पादक राज्य में इतना नुकसान हो तो कीमतें चढ़ ही जाएंगी। लेकिन अच्छी बात यह है कि सरकार ने पहले से ही अफ्रीका की ओर रुख कर लिया है। तंजानिया, मोजांबिक और मलावी से तूर $550 यानी करीब 48,500 रुपये प्रति टन के भाव पर मंगाई जा रही है। यह कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य के 80,000 रुपये प्रति टन से काफी कम है, इसलिए उपभोक्ताओं पर बोझ नहीं पड़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि आयात से घरेलू कमी की भरपाई हो जाएगी, और दाल की कीमतें स्थिर रहेंगी। वैसे, हाल की रिपोर्ट्स बताती हैं कि कर्नाटक जैसे दूसरे राज्यों में भी तूर पर रोग का असर पड़ा है, जिससे कुल उत्पादन 10-12 फीसदी गिर सकता है। लेकिन आयात का जुगाड़ पहले से है, तो बाजार ज्यादा उथल-पुथल नहीं होगा।

किसानों के लिए मुआवजे की राहत, लेकिन चुनौतियां बरकरार

सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए 31,628 करोड़ रुपये का राहत पैकेज घोषित किया है। सूखी जमीन वाले किसानों को हेक्टेयर당 18,500 रुपये, आंशिक सिंचित को 27,000 और पूरी तरह सिंचित को 32,500 रुपये मिलेंगे। इसके अलावा, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत इंश्योर्ड किसानों को 17,000 रुपये अतिरिक्त। लेकिन किसान भाई कहते हैं कि यह मुआवजा तो ठीक है, लेकिन अगले मौसम की तैयारी के लिए और मदद चाहिए। मराठवाड़ा जैसे सूखाग्रस्त इलाकों में बाढ़ जैसी विपदा ने सब कुछ बदल दिया। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अच्छी किस्मों के बीज चुनें, जैविक खाद का इस्तेमाल करें और ड्रेनेज सिस्टम मजबूत बनाएं ताकि अगली बार नुकसान कम हो।

ये भी पढ़ें- Paddy Mandi Price Today: अलीगढ़ में बासमती ₹2950 तो कानपुर में ₹3230 रहा सामान्य चावल का रेट, जानिए आज का मंडी भाव

Leave a Comment