किसान भाइयों, आलू की खेती सिर्फ़ देश में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में भोजन का आधार है। इसकी माँग साल भर बनी रहती है, और जैविक खेती के ज़रिए आप न सिर्फ़ गुणवत्ता वाली फसल उगा सकते हैं, बल्कि बाज़ार में अच्छे दाम भी पा सकते हैं। जैविक आलू की खेती से मिट्टी की सेहत बनी रहती है और रासायनिक खादों का खर्च भी बचता है। लेकिन तकनीकी जानकारी की कमी के कारण कई किसान भाई बंपर पैदावार नहीं ले पाते। आइए, जानें कि आलू की जैविक खेती कैसे करें, कौन सी किस्में चुनें, और इसे मुनाफे का ज़रिया कैसे बनाएँ।
ठंडा मौसम, आलू का साथी
आलू की खेती के लिए ठंडा मौसम सबसे अच्छा है, जहाँ पाला न पड़ता हो। 20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर आलू के कंद सबसे अच्छे बनते हैं। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, कंदों का निर्माण कम होने लगता है, और 30 डिग्री सेल्सियस पर ये पूरी तरह रुक जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सितंबर से नवंबर का समय आलू की बुवाई के लिए आदर्श है। अगर आप अगेती फसल लेना चाहते हैं, तो सितंबर में बुवाई करें, लेकिन ध्यान रखें कि कंदों को बिना काटे बोएँ, वरना गर्मी में सड़ने का खतरा रहता है।
ये भी पढ़ें – 1 एकड़ में 150 क्विंटल आलू उत्पादन, 40% अधिक मुनाफा और ₹1.5 लाख तक आमदनी
मिट्टी की सही तैयारी
आलू की जैविक खेती (Organic potato farming) के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि कंद ज़मीन के अंदर बनते हैं। दोमट या रेतीली दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी है, जिसमें पी.एच. मान 5.2 से 6.5 हो। अगर मिट्टी में जैविक पदार्थ ज़्यादा हों, तो फसल और बेहतर होगी। खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें, फिर दो-तीन बार देसी हल या हैरो से जुताई करें। प्रति हेक्टेयर 10-15 टन सड़ी गोबर खाद या वर्मी कंपोस्ट डालें। मिट्टी की जाँच करवाएँ, ताकि पोषक तत्वों की सही मात्रा का पता चले। जल निकासी की अच्छी व्यवस्था करें, ताकि पानी खेत में जमा न हो।
उन्नत किस्में, बंपर पैदावार
आलू की कई उन्नत किस्में हैं, जो जैविक खेती के लिए उपयुक्त हैं। अगेती किस्में जैसे कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी पुखराज, और कुफरी ख्याति 80-100 दिनों में तैयार हो जाती हैं। ये किस्में उन किसानों के लिए अच्छी हैं, जो एक सीज़न में दो फसलें लेना चाहते हैं। मध्यम समय वाली किस्में जैसे कुफरी ज्योति, कुफरी बादशाह, और कुफरी चिप्सोना-1 90-110 दिनों में पकती हैं और चिप्स बनाने के लिए मशहूर हैं।
देर से पकने वाली किस्में जैसे कुफरी सिंदूरी 110-120 दिनों में तैयार होती हैं। संकर किस्में जैसे कुफरी जवाहर और कुफरी अशोक भी अच्छी उपज देती हैं। विदेशी किस्में जैसे अपटूडेट और क्रेग्स डिफाइन्स को भारतीय मिट्टी के लिए अनुकूल बनाया गया है, जो बाज़ार में अच्छे दाम लाती हैं।
बीज उपचार और बुवाई का तरीका
जैविक खेती में बीज उपचार बहुत ज़रूरी है, ताकि रोगों से बचाव हो। आलू के कंदों को 50 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी को 10 लीटर जीवामृत या पानी में मिलाकर 15-20 मिनट भिगोएँ। फिर छाँव में सुखाकर बुवाई करें। ध्यान रखें कि क्षारीय मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल न करें। बुवाई अक्टूबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर के दूसरे हफ्ते तक करें। समतल खेत, मेड़, पोटैटो प्लांटर, या दोहरी कुंड विधि से बुवाई कर सकते हैं। प्रति हेक्टेयर 20-25 क्विंटल बीज की ज़रूरत होती है। कंदों को 45-60 सेंटीमीटर की दूरी पर 5-6 सेंटीमीटर गहराई में बोएँ। बुवाई के बाद हल्की सिंचाई करें।
ये भी पढ़ें – देसी मटन चिकन कहलाती है यह सब्जी, कीजिए इस गोभी की ओर्गेनिक खेती, कमाई होगी छप्परफाड़
सिंचाई और खरपतवार प्रबंधन
आलू की जड़ें उथली होती हैं, इसलिए इसे बार-बार हल्की सिंचाई की ज़रूरत पड़ती है। औसतन 60-65 सेंटीमीटर पानी की ज़रूरत होती है। बुवाई के 3-5 दिन बाद पहली सिंचाई करें और मिट्टी को हमेशा नम रखें। ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी की बचत होती है। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 20-30 दिन बाद एक बार निराई-गुडाई करें। इस दौरान ध्यान रखें कि पौधों के तने बाहर न आएँ, वरना सूरज की रोशनी से हरे होकर कंद खराब हो सकते हैं। बुवाई के 25-30 दिन बाद मिट्टी चढ़ाएँ, ताकि कंद अच्छे बनें। अगर पोटैटो प्लांटर से बुवाई की है, तो मिट्टी चढ़ाने की ज़रूरत नहीं।
कीट और रोगों से जैविक बचाव
जैविक खेती में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता। अगेती और पछेती झुलसा रोग से बचने के लिए 2-3 साल का फसल चक्र अपनाएँ। रोगरोधी किस्में जैसे कुफरी ज्योति, कुफरी बादशाह, या कुफरी आनंद चुनें। झुलसा रोग में पत्तियों पर भूरे-काले धब्बे बनते हैं, जो नम मौसम में तेज़ी से फैलते हैं। रोगग्रस्त पत्तियों को इकट्ठा करके जला दें। माहूँ, आलू का पतंगा, और कटुआ जैसे कीटों से बचने के लिए नीम तेल (5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
बंपर पैदावार, मुनाफे की उड़ान
आलू की जैविक खेती से 250-600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल सकती है, जो मिट्टी, किस्म, और देखभाल पर निर्भर करता है। शुरुआती 1-2 साल में उत्पादन 5-15% कम हो सकता है, लेकिन जैविक मिट्टी तैयार होने पर उपज बढ़ जाती है। बाज़ार में जैविक आलू 20-40 रुपये प्रति किलो बिकता है, जो रासायनिक आलू से दोगुना मुनाफा देता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, और पंजाब के किसान भाई इस खेती को अपनाएँ और अपने खेतों को समृद्ध बनाएँ।
ये भी पढ़ें – बिना पैसे, बिना मशीन! MP के इस गार्डन में फूल-पत्तियों से बनती है देसी खाद, खेत में डालते ही दोगुना होगा उत्पाद