देश में पराली जलाने की समस्या सालों से किसानों और सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है। दिल्ली-एनसीआर से लेकर पंजाब, हरियाणा और यूपी तक हर साल अक्टूबर-नवंबर में धुआं और प्रदूषण का आलम रहता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ब्रेकथ्रू तकनीक खोजी है जिससे पराली (गेहूं और धान की ठूंठ) अब कचरा नहीं रहेगी बल्कि सड़क बनाने की मजबूत और सस्ती सामग्री बनेगी। इस तकनीक से न सिर्फ प्रदूषण कम होगा बल्कि किसानों को पराली बेचने से अतिरिक्त कमाई भी होगी।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के वैज्ञानिकों और भारतीय सड़क कांग्रेस के सहयोग से विकसित इस तकनीक में पराली को पीसकर, रासायनिक उपचार देकर और बिटुमिन के साथ मिलाकर सड़क की ऊपरी परत (सर्फेस कोर्स) में इस्तेमाल किया जा रहा है। ये पराली वाली सड़कें सामान्य सड़कों से ज्यादा मजबूत और टिकाऊ साबित हुई हैं। पराली की वजह से सड़क की लागत भी 10-15 प्रतिशत तक कम आती है।
पराली से सड़क बनाने की तकनीक कैसे काम करती है
वैज्ञानिकों ने बताया कि पराली को पहले छोटे-छोटे टुकड़ों में पीसा जाता है। फिर इसे एक खास रासायनिक घोल से उपचारित किया जाता है ताकि वो पानी और मौसम से प्रभावित न हो। इसके बाद इसे बिटुमिन (टार) के साथ मिलाकर सड़क की लेयर में डाला जाता है। ये मिश्रण सड़क को ज्यादा मजबूती देता है और दरारें आने से रोकता है। कई जगहों पर पायलट प्रोजेक्ट चलाए गए हैं, जैसे पंजाब और हरियाणा में कुछ ग्रामीण सड़कों पर। टेस्टिंग में पाया गया कि पराली वाली सड़कें सामान्य सड़कों से 20-30 प्रतिशत ज्यादा वजन सहन कर सकती हैं।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा ये है कि किसानों को पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे पराली को सीधे सड़क निर्माण कंपनियों या ठेकेदारों को बेच सकेंगे। प्रति एकड़ पराली से किसान को 1500 से 2500 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है। साथ ही जलाने से होने वाला प्रदूषण और हवा की गुणवत्ता पर असर भी कम होगा।
जल्द पूरे देश में लागू होगी तकनीक
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री ने कहा है कि पराली से सड़क बनाने की तकनीक को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाएगा। ग्रामीण सड़कों (PMGSY) और राज्य राजमार्गों में पहले चरण में इस्तेमाल किया जाएगा। पंजाब, हरियाणा, यूपी और राजस्थान जैसे राज्यों में जहां पराली की समस्या सबसे ज्यादा है, वहां पहले पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो चुके हैं। ठेकेदारों को पराली इस्तेमाल करने पर प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
किसान संगठनों ने भी इस तकनीक का स्वागत किया है। उनका कहना है कि पराली जलाने से होने वाले जुर्माने और प्रदूषण की समस्या अब खत्म हो जाएगी। किसानों को पराली बेचने के लिए अलग से मंडी या खरीद केंद्र बनाने की मांग भी उठी है ताकि उन्हें आसानी से अच्छा दाम मिले।
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