धान की फसल पर इन दिनों स्वार्मिंग केटरपिलर (स्पोडोप्टेरा मॉरीशिया) नामक कीट का प्रकोप बढ़ रहा है। इस कीट की वजह से किसानों की मेहनत पर पानी फिरने का खतरा है। बूंदी के डोरा और तुलसी गांवों में कृषि विभाग के विशेषज्ञों ने दौरा किया और पाया कि यह कीट धान के पौधों को बर्बाद कर रहा है। कृषि वैज्ञानिक प्रो. हरीश वर्मा, संयुक्त निदेशक कौशल कुमार सोमाणी, और कृषि पर्यवेक्षक हेमराज वर्मा ने किसानों को इस कीट की पहचान और नियंत्रण के तरीके बताए हैं।
स्वार्मिंग केटरपिलर की पहचान
स्वार्मिंग केटरपिलर एक ऐसा कीट है, जो धान की फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है। शुरुआती अवस्था में यह हल्के हरे रंग का होता है, जिस पर पीली-सफेद धारियां दिखती हैं। जैसे-जैसे यह बढ़ता है, इसका रंग गहरा भूरा या धूसर हरा हो जाता है, और इसके किनारों पर अर्धचंद्राकार काले धब्बे उभर आते हैं। यह कीट झुंड में रहता है और धान की पत्तियों को खाकर नष्ट कर देता है।
कई बार यह पौधे के तने को भी काट देता है, जिससे खेत में ऐसा लगता है जैसे कोई जानवर चर गया हो। इसकी लट 3.8 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती है और इसका जीवन चक्र 25 से 40 दिन का होता है। मादा कीट 200-300 अंडे देती है, जो मलाईदार सफेद और भूरे बालों से ढके होते हैं। पतंगे राख-भूरे रंग के होते हैं, जिनके अगले पंखों पर त्रिकोणीय काला धब्बा होता है।
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कीट प्रकोप की वजह और नुकसान
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल इस कीट के प्रकोप को बढ़ा रहा है। कई किसान नाइट्रोजन युक्त खाद को जरूरत से ज्यादा डाल देते हैं, जिससे पौधे रसीले हो जाते हैं और कीटों को आकर्षित करते हैं। यह कीट धान की पत्तियों और तनों को खाकर फसल की वृद्धि रोक देता है। छोटे पौधों को यह सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है, जिससे पैदावार 20-30% तक कम हो सकती है। अगर समय पर नियंत्रण न किया जाए, तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। बूंदी में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है, और इस कीट का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी चिंता का कारण बन रहा है।
कीट नियंत्रण के आसान तरीके
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि स्वार्मिंग केटरपिलर से बचाव के लिए एकीकृत प्रबंधन अपनाएं। सबसे पहले, खेत और आसपास के खरपतवारों को हटाएं, क्योंकि ये कीटों के छिपने और प्रजनन का ठिकाना बनते हैं। खेत में डंडे या अड्डे लगाएं, ताकि परभक्षी पक्षी बैठ सकें। बत्तखों को खेत में छोड़ने से लट खाने में मदद मिलती है। ततैया और मकड़ियों जैसे प्राकृतिक शत्रुओं को भी बढ़ावा दें। जैविक नियंत्रण के लिए बैसिलस थुरिजिएसिस (बीटी) या स्पोडोप्टेरा मौरेटिया न्यूक्लियोपॉलीहेड्रोवायरस (एसएमएनपीवी) का छिड़काव करें। नीम के तेल या नीम के अर्क का 5% घोल बनाकर छिड़काव भी कारगर है।
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रासायनिक नियंत्रण के उपाय
अगर कीट का प्रकोप ज्यादा हो, तो शुरुआती लार्वा अवस्था में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करें। क्लोरोपाइरीफॉस 20 ई.सी. या क्यूनॉलफॉस 25 ई.सी. की 1.5 लीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। यह छिड़काव शाम के समय करें, ताकि कीटों पर ज्यादा असर हो। अगर 15 दिन बाद भी कीट नियंत्रित न हों, तो लेम्डासायहेलोथिन 5 ई.सी. की 300 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर छिड़कें। कीटनाशकों का सही अनुपात और समय का ध्यान रखें। छिड़काव के एक हफ्ते तक खेत से पशुओं के लिए चारा न लें। अपने नजदीकी कृषि पर्यवेक्षक से सलाह लेकर सही दवा और मात्रा का उपयोग करें।
किसानों के लिए सलाह
किसान भाइयों, धान की फसल को स्वार्मिंग केटरपिलर से बचाने के लिए खेत की नियमित जांच करें। यूरिया का इस्तेमाल संतुलित मात्रा में करें, ताकि पौधे कीटों को न बुलाएं। खरपतवारों को समय-समय पर साफ करते रहें। जैविक और रासायनिक तरीकों को मिलाकर कीट नियंत्रण करें। बूंदी में धान की खेती आपकी मेहनत का बड़ा हिस्सा है, इसलिए समय पर कदम उठाएं। अपने नजदीकी कृषि केंद्र से संपर्क करें और विशेषज्ञों की सलाह लें। सही समय पर सही कदम उठाकर आप अपनी फसल को बचा सकते हैं और अच्छी पैदावार पा सकते हैं।
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