मक्का उगाकर भी गरीब क्यों है बिहार का किसान? MSP, तस्करी और सिस्टम की पूरी सच्चाई

बिहार के लाखों किसान भाई मक्के की खेती में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। बेहतर क्वालिटी का दाना उगाते हैं, लेकिन जब बेचने की बारी आती है तो दिल टूट जाता है। एमएसपी तो दूर, कई बार लागत भी नहीं निकल पाती। देश में मक्के के निर्यात में उछाल आ रहा है, लेकिन बिहार के किसानों को इसका फायदा कहां दिख रहा है? आज इसी दर्द की बात कर रहा हूं, ताकि सब समझें कि असली समस्या क्या है और हालात कैसे सुधर सकते हैं।

बिहार में मक्के की खेती मेहनत बहुत, कमाई कम

बिहार देश के बड़े मक्का उत्पादक राज्यों में शुमार है। लाखों किसान परिवार इस फसल पर निर्भर हैं। खेती अच्छी होती है, दाना भरपूर लगता है, लेकिन बाजार में बेचते वक्त भाव इतना गिर जाता है कि मेहनत पर पानी फिर जाता है। कई किसान भाई बताते हैं कि एमएसपी तय तो होता है, लेकिन खरीद कहां होती है? केंद्र सरकार ने खरीफ 2025-26 के लिए मक्के का एमएसपी 2400 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जो पिछले साल से 175 रुपये ज्यादा है। लेकिन हकीकत ये है कि ज्यादातर किसानों को 1900-2100 रुपये तक ही मिलता है।

समस्या सिर्फ एमएसपी की नहीं है। प्रोसेसिंग यूनिट की भारी कमी है। बिहार में मक्के को प्रोसेस करने, स्टोर करने और वैल्यू एडिशन करने की अच्छी व्यवस्था नहीं है। नतीजा? बाहर के व्यापारी सस्ते में खरीद लेते हैं और महंगे में बेचकर मुनाफा कमाते हैं।

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मक्के की तस्करी और व्यापारियों का खेल

बिहार का मक्का अक्सर बांग्लादेश तक पहुंच जाता है, जहां पोल्ट्री फीड बनता है। फिर वही फीड बिहार में महंगे दामों पर बिकता है। किसान भाई दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन फायदा बाहर के व्यापारी उठाते हैं। सरकार पर आरोप लगता है कि खरीद और प्रोसेसिंग की व्यवस्था ठीक नहीं है। व्यापारी मकड़जाल फैलाए बैठे हैं। किसान सस्ते में बेचने को मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि कोई विकल्प नहीं। अगर सरकार खुद खरीद बढ़ाए या प्रोसेसिंग प्लांट लगाए तो ये खेल रुक सकता है।

बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न का सपना अधूरा क्यों?

बिहार सरकार हर साल स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न के लिए बीज बांटती है, ताकि फसल विविधीकरण हो और कमाई बढ़े। लेकिन हकीकत ये है कि कागजों पर तो सब अच्छा दिखता है, लेकिन असल में सिर्फ 10% बीज ही किसानों तक पहुंच पाते हैं। बाकी की खानापूर्ति हो जाती है। नतीजा? बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की खेती का दायरा नहीं बढ़ पाता। ज्यादातर किसान सामान्य मक्के पर ही टिके रहते हैं, जहां कमाई की गुंजाइश कम है।

जो थोड़े बहुत किसान स्वीट कॉर्न या बेबी कॉर्न लगाते हैं, उन्हें भी सही दाम नहीं मिलता। प्राइवेट प्रोसेसिंग यूनिट कम रेट ऑफर करती हैं, स्वीट कॉर्न 9 रुपये किलो और बेबी कॉर्न 40-50 रुपये किलो। ट्रांसपोर्ट का खर्च भी नहीं निकलता। इससे बेहतर तो सामान्य मक्के का भाव लग जाता है। होटलों में दूसरे राज्यों का बेबी कॉर्न महंगे दामों पर बिकता है, लेकिन बिहार का माल कोई नहीं लेता।

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असली समस्या कहां है?

दो मुख्य वजहें हैं, पहली, प्रोसेसिंग यूनिट की कमी। बिहार में मक्के को पोल्ट्री फीड, स्टार्च या एथेनॉल में बदलने के बड़े प्लांट नहीं हैं। दूसरी, बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की खेती सिमटी हुई है। बीज बंटवारे में गड़बड़ी और सही बाजार न मिलना किसानों को हतोत्साहित करता है।

समस्तीपुर के किसान उमाशंकर, जो बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की कमर्शियल खेती करते हैं, कहते हैं कि हालात तभी सुधरेंगे जब सरकार खुद प्रोसेसिंग प्लांट लगाए या एनजीओ के जरिए लगवाए। निजी यूनिट अगर गारंटीड रेट दें, जैसे बेबी कॉर्न 80 रुपये किलो और स्वीट कॉर्न 15 रुपये किलो तो किसान आगे आएंगे।

सरकार को क्या करना चाहिए?

सरकार को बिहार में प्रोसेसिंग यूनिट का जाल बिछाना चाहिए। लोकल मक्के से ही पोल्ट्री फीड बने, तो निर्यात की जरूरत कम होगी और किसानों की इनकम बढ़ेगी। प्रदेश के होटलों से बात कर बिहार के बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की सप्लाई सुनिश्चित करें। अगर ये कदम उठे तो किसान सामान्य मक्के से हटकर वैल्यू एडेड फसलें लगाएंगे।

भाइयो, मक्के की खेती बिहार के किसानों की जान है। मेहनत बहुत है, लेकिन फायदा कम। सरकार, व्यापारी और हम सब मिलकर सोचें कि कैसे इसे बदलें। अगर प्रोसेसिंग, खरीद और बाजार की व्यवस्था मजबूत हुई तो लाखों परिवारों की हालत सुधरेगी।

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  • Dharmendra

    मै धर्मेन्द्र एक कृषि विशेषज्ञ हूं जिसे खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी साझा करना और नई-नई तकनीकों को समझना बेहद पसंद है। कृषि से संबंधित लेख पढ़ना और लिखना मेरा जुनून है। मेरा उद्देश्य है कि किसानों तक सही और उपयोगी जानकारी पहुंचे ताकि वे अधिक उत्पादन कर सकें और खेती को एक लाभकारी व्यवसाय बना सकें।

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