आजकल दुनिया की नजरें ईरान पर टिकी हुई हैं। वहाँ आंतरिक विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट की आशंकाएँ चर्चा में हैं। लेकिन इस सबके बीच एक ऐसी चीज है जो भारत के किसानों और आम लोगों के दिल को छूती है, केसर (Saffron), जिसे ‘रेड गोल्ड’ भी कहा जाता है। ईरान दुनिया का सबसे बड़ा केसर उत्पादक देश है, और वहाँ की अस्थिरता का असर सीधे केसर की कीमतों पर पड़ रहा है।
ईरान दुनिया का केसर का राजा
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के कुल केसर उत्पादन का 85 से 90 प्रतिशत (कुछ अनुमानों में 90% से भी ज्यादा) अकेला ईरान पैदा करता है। ईरान का मुख्य उत्पादन क्षेत्र खोरासान प्रांत है, जहाँ की ठंडी जलवायु, सूखी मिट्टी और सदियों पुरानी पारंपरिक खेती पद्धति केसर के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
यहाँ केसर की खेती मुख्य रूप से छोटे और मध्यम किसानों द्वारा की जाती है। कोई बड़ी फैक्ट्री या इंडस्ट्री नहीं, बल्कि लाखों परिवार हाथ से फूल तोड़ते हैं, स्टिग्मा (केसर के धागे) अलग करते हैं और सुखाते हैं। एक किलो शुद्ध केसर बनाने के लिए लगभग 1.5 से 2 लाख फूल चाहिए। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक किलो केसर की कीमत लाखों रुपये तक पहुँच जाती है। ईरान की अर्थव्यवस्था में केसर को “रेड गोल्ड इकॉनमी” कहा जाता है, क्योंकि ये ग्रामीण रोजगार और निर्यात आय का मजबूत स्तंभ है।
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राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक प्रतिबंध और आंतरिक तनाव के बावजूद केसर की खेती ईरान के ग्रामीण इलाकों को सहारा देती रही है। लेकिन जब देश अस्थिरता से गुजरता है, तो सप्लाई चेन प्रभावित होती है, फसल की देखभाल में दिक्कत आती है और निर्यात में गिरावट आती है, जिसका सीधा असर वैश्विक कीमतों पर पड़ता है।
भारत-ईरान का मजबूत कृषि व्यापार
भारत और ईरान के बीच सदियों पुराना सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ता रहा है। माना जाता है कि ऐतिहासिक सिल्क रोड और अन्य व्यापार मार्गों से ही केसर ईरान से कश्मीर पहुँचा, जहाँ आज कश्मीरी केसर दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है।
आज ये रिश्ता सिर्फ परंपरा तक सीमित नहीं रहा। वित्त वर्ष 2024-25 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत ने ईरान को 8,919 करोड़ रुपये से ज्यादा मूल्य के कृषि उत्पाद निर्यात किए। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बासमती चावल का है, करीब 6,374 करोड़ रुपये के 8.55 लाख मीट्रिक टन बासमती ईरान भेजी गई। ईरान भारतीय बासमती का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है, जिसकी कुल हिस्सेदारी 12.67% है।
इसके अलावा भारत ने ईरान को:
- 469 करोड़ रुपये के ताजा फल
- 320 करोड़ रुपये की चाय
- 591 करोड़ रुपये की खली (पशु आहार)
- 271 करोड़ रुपये की दालें
- 247 करोड़ रुपये के मसाले
निर्यात किए। अन्य उत्पादों में मूंगफली, भैंस का मीट, प्रोसेस्ड फूड, आयुष और हर्बल उत्पाद, नॉन-बासमती चावल, कॉफी, डेयरी उत्पाद और प्रोसेस्ड फल-जूस शामिल हैं।
ईरान में अस्थिरता का केसर पर असर
जब ईरान में राजनीतिक हलचल बढ़ती है, तो केसर की फसल प्रभावित होती है। किसान प्रदर्शनों में शामिल होते हैं, परिवहन बाधित होता है, निर्यात में देरी होती है और कई बार फसल की देखभाल भी ठीक से नहीं हो पाती। नतीजा? वैश्विक बाजार में केसर की उपलब्धता कम होती है और कीमतें तेजी से बढ़ती हैं।
भारत में भी केसर की कीमतें पिछले कुछ महीनों में काफी ऊपर गई हैं। ईरान से आयात होने वाला केसर (जो भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है) महंगा होने से कश्मीरी केसर की मांग भी बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन सीमित होने से उसकी कीमत भी ऊँची बनी हुई है।
भारत के लिए क्या मतलब?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा केसर उत्पादक देश है (मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर में), लेकिन उत्पादन बहुत कम है, कुल वैश्विक उत्पादन का महज 5-7%। इसलिए भारत को ईरान से काफी मात्रा में केसर आयात करना पड़ता है। ईरान में अस्थिरता लंबी चली तो भारत में केसर महंगा हो जाएगा, जो मिठाइयों, दवाइयों, आयुर्वेदिक उत्पादों और रोजमर्रा के इस्तेमाल में असर डालेगा।
लेकिन अच्छी बात ये है कि भारत ईरान के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध बनाए रखना चाहता है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, कृषि और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है। अगर ईरान में स्थिति जल्दी सामान्य होती है, तो केसर की सप्लाई स्थिर रहेगी और कीमतें काबू में रहेंगी।
किसान भाइयों के लिए संदेश
जो किसान भाई कश्मीर या अन्य क्षेत्रों में केसर की खेती करते हैं, उनके लिए ये समय सुनहरा है। ईरान में अस्थिरता से कश्मीरी केसर की मांग और दाम बढ़ रहे हैं। अगर आप भी केसर की खेती में रुचि रखते हैं, तो प्रमाणित बीज और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं।
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