स्ट्रॉबेरी की खेती में देसी जुगाड़ अपनाएं! लागत घटेगी, उत्पादन बढ़ेगा और मुनाफा होगा दोगुना

स्ट्रॉबेरी उगाने वाले किसान भाइयों के लिए एक बड़ी समस्या होती है कि फल जमीन को छूते ही सड़ने लगते हैं। इससे फंगल संक्रमण हो जाता है और फलों की क्वालिटी खराब हो जाती है। नाम ही स्ट्रॉबेरी है, मतलब पुआल पर उगने वाली बेरी। इसलिए इस खेती में मल्चिंग करना बहुत जरूरी है। मल्चिंग यानी पौधों की जड़ों के आसपास जमीन को किसी सामग्री से ढक देना, ताकि फल सीधे मिट्टी से न छूएं। बाजार में प्लास्टिक वाली मल्च तो मिलती है, लेकिन वो काफी महंगी पड़ती है। ऐसे में कृषि विशेषज्ञ एक देसी और सस्ता तरीका बता रहे हैं ऑर्गेनिक मल्चिंग।

झारखंड के पलामू जैसे इलाकों में स्ट्रॉबेरी की खेती करने वाले किसान अब धान के पुआल, गेहूं के भूसे या आसपास की सूखी घास का इस्तेमाल मल्च के तौर पर कर रहे हैं। ये सामग्री गांव में आसानी से मिल जाती है और खर्चा लगभग न के बराबर। कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं कि प्लास्टिक मल्च की बजाय ये ऑर्गेनिक तरीका अपनाएं तो खेती की लागत काफी कम हो जाएगी। साथ ही फसल की पैदावार भी बढ़ेगी और किसानों की कमाई दोगुनी हो सकती है।

ऑर्गेनिक मल्चिंग से क्या-क्या फायदे मिलते हैं

इस देसी मल्चिंग का सबसे बड़ा फायदा ये है कि मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है। पानी देने की जरूरत कम पड़ती है और पौधे अच्छे से बढ़ते हैं। खरपतवार यानी अनचाही घास अपने आप कम उगती है, क्योंकि सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुंच पाती। इससे पौधों को सारे पोषक तत्व मिलते हैं और जड़ें मजबूत बनती हैं। डॉ. कुमार बताते हैं कि मल्चिंग से मिट्टी का तापमान भी संतुलित रहता है – न ज्यादा ठंडा, न ज्यादा गर्म। बारिश में मिट्टी का कटाव नहीं होता और जड़ों का विकास बेहतर होता है।

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सबसे खास बात ये कि धान का पुआल या सूखी घास समय के साथ मिट्टी में घुल-मिल जाती है। इससे खेत में जैविक खाद बढ़ती है और जमीन की उर्वरता साल दर साल बेहतर होती जाती है। प्लास्टिक मल्च तो इस्तेमाल के बाद कचरा बन जाता है, लेकिन ये ऑर्गेनिक वाला पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। फल साफ-सुथरे रहते हैं, सड़ते नहीं और बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं। कई किसानों ने इसे आजमाया और बताया कि पहले जहां प्लास्टिक पर हजारों रुपये खर्च होते थे, अब वो पैसे बच रहे हैं।

कैसे करें ऑर्गेनिक मल्चिंग?

मल्चिंग करना बहुत आसान है। पौधे लगाने के बाद उनकी पंक्तियों के बीच अच्छे से धान का पुआल या भूसा बिछा दें। करीब 4-6 इंच मोटी परत बना लें, ताकि जमीन पूरी तरह ढक जाए लेकिन पौधे का तना खुला रहे। सूखी घास भी अच्छा काम करती है। सर्दियों में ये ठंड से भी बचाती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि अपने इलाके में जो सामग्री आसानी से मिले, उसी का इस्तेमाल करें। इससे न सिर्फ खर्चा कम होगा, बल्कि फसल की क्वालिटी भी टॉप क्लास रहेगी।

अगर आप भी स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं या शुरू करने का प्लान बना रहे हैं तो इस देसी जुगाड़ को जरूर आजमाएं। लागत कम होगी, मेहनत का फल अच्छा मिलेगा और परिवार की आमदनी बढ़ेगी। अपने नजदीकी कृषि केंद्र से और सलाह ले सकते हैं। ये छोटा सा बदलाव आपकी खेती को मुनाफे का धंधा बना सकता है।

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  • Shashikant

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