आलू किसान सावधान! अभी ये काम नहीं किए तो पैदावार पर पड़ेगा सीधा असर, एक्सपर्ट से जानें

Potato Farming Tips: छत्तीसगढ़ समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में नवंबर-दिसंबर में बोई गई आलू की फसल अब कंद बनने की महत्वपूर्ण अवस्था में पहुंच चुकी है। जनवरी का ये समय फसल के लिए बहुत संवेदनशील है। थोड़ी सी लापरवाही भी पैदावार पर भारी असर डाल सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र रायपुर के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार साहू ने किसानों को चेतावनी दी है कि इस चरण में सिंचाई, खाद प्रबंधन और खासकर मिट्टी चढ़ाई पर पूरा ध्यान देना जरूरी है। अगर ये काम समय पर नहीं हुए तो कंद छोटे रह जाएंगे, संख्या कम होगी और कुल उत्पादन घट जाएगा।

डॉ. साहू कहते हैं कि आलू की खेती में कंद विकास के लिए बराबर नमी और पोषक तत्वों की जरूरत होती है। नमी की कमी से कंद का आकार प्रभावित होता है और फसल कमजोर पड़ जाती है। इसलिए सिंचाई नियमित रखें, लेकिन जलभराव से बचें।

मिट्टी चढ़ाई क्यों और कैसे करें

इस समय का सबसे जरूरी काम मिट्टी चढ़ाई है। डॉ. साहू की सलाह है कि पहले खेत में अच्छी तरह गुड़ाई करें, ताकि खरपतवार निकल जाएं और मिट्टी ढीली हो जाए। फिर आलू के पौधों के तने तक भुरभुरी मिट्टी चढ़ाएं। मिट्टी जितनी अच्छी तरह ढीली और भुरभुरी होगी, उतने ही अच्छे से कंद बैठेंगे और विकसित होंगे। ठंड का मौसम कंद बनने के लिए सबसे उपयुक्त होता है, इसलिए समय पर मिट्टी चढ़ाई करने से झमाझम बड़े-बड़े कंद बनते हैं। ये काम न सिर्फ उत्पादन बढ़ाता है, बल्कि आलू की गुणवत्ता और आकार दोनों को बेहतर बनाता है। कई किसान ये भूल जाते हैं और बाद में पछताते हैं कि कंद छोटे रह गए।

अर्ली-लेट ब्लाइट से कैसे बचें

ठंड और बदली के मौसम में आलू की फसल में फंगल रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। सबसे आम हैं अर्ली ब्लाइट और लेट ब्लाइट। इनकी शुरुआत पत्तियों पर धब्बों से होती है पहले ऊपर चकत्ते बनते हैं, जो धीरे-धीरे सूखते हुए अंदर की ओर फैलते हैं। पत्तियां भूरे रंग की होकर जली हुई जैसी दिखने लगती हैं। डॉ. साहू बताते हैं कि अगर ये लक्षण दिखें तो तुरंत टेबूकोनाजोल या हेक्साकोनाजोल जैसी दवा का छिड़काव करें। टेबूकोनाजोल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर स्प्रे करें। ये रोग जल्दी कंट्रोल हो जाते हैं।

एक और गंभीर रोग है पछेती अंगमारी, जिसमें पत्तियों पर बूंदी-बूंदी जैसे धब्बे पड़ते हैं और तेजी से फैलते हैं। इसके लिए भी 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से उपयुक्त फंगीसाइड का छिड़काव करें। मौसम में बदलाव या बारिश के बाद खेत की नियमित जांच करें, ताकि रोग शुरुआत में ही पकड़ में आ जाए।

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  • Shashikant

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