किसान भाइयों के लिए केंद्र सरकार से बड़ी राहत की खबर आई है। रबी फसलों की अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी NBS की नई दरें मंजूर कर दी गई हैं। ये दरें 1 अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 तक लागू रहेंगी। सरकार का मुख्य मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतें बढ़ने पर भी किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराना है। इससे डीएपी, एनपीके जैसी प्रमुख खादें महंगी नहीं होंगी और खेतों में पोषक तत्वों की कमी नहीं आएगी।
इस बार रबी के लिए अनुमानित बजट 37,952.29 करोड़ रुपये रखा गया है, जो पिछले खरीफ सीजन से 736 करोड़ ज्यादा है। पिछले तीन सालों में सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर 2.04 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं। ये पैसा सीधे किसानों के फायदे में लग रहा है, क्योंकि NBS योजना में सब्सिडी बोरी पर नहीं बल्कि खाद में मौजूद पोषक तत्वों के हिसाब से दी जाती है।
पोषक तत्वों की नई NBS दरें
सरकार ने नाइट्रोजन, फॉस्फेट जैसे मुख्य पोषक तत्वों की दरें बढ़ाई हैं। नाइट्रोजन पर 43.02 रुपये प्रति किलोग्राम और फॉस्फेट पर 47.96 रुपये प्रति किलोग्राम सब्सिडी मिलेगी। सबसे खुशी की बात डीएपी के लिए है – प्रति मीट्रिक टन सब्सिडी 29,805 रुपये हो गई है, जो पिछले साल के 21,911 रुपये से करीब 36 फीसदी ज्यादा है। एमओपी यानी पोटाश पर 1,428 रुपये प्रति टन की मदद मिलेगी।
एनपीके कॉम्प्लेक्स खादों के लिए भी अच्छी सब्सिडी तय की गई है। जैसे 19-19-19 ग्रेड पर 17,738 रुपये और 12-32-16 ग्रेड पर 20,890 रुपये प्रति टन। सिंगल सुपर फॉस्फेट यानी एसएसपी पर 7,408 रुपये और यूरिया-एसएसपी कॉम्प्लेक्स पर 9,088 रुपये की सब्सिडी मिलेगी। कुल 28 प्रकार के उर्वरक ग्रेड पर ये मदद दी जा रही है, जो देश की अलग-अलग मिट्टी और फसलों को ध्यान में रखकर तय की गई हैं।
सूक्ष्म पोषक तत्वों को भी प्रोत्साहन
मिट्टी में मुख्य पोषकों के साथ-साथ सूक्ष्म तत्वों की कमी भी बड़ी समस्या बन रही है। इसलिए सरकार ने बोरॉन लेपित खाद पर 300 रुपये और जिंक लेपित खाद पर 500 रुपये प्रति टन अतिरिक्त सब्सिडी का ऐलान किया है। इससे किसान भाई आसानी से ये खादें इस्तेमाल कर सकेंगे और फसल की क्वालिटी बढ़ेगी।
किसानों को होगा सीधा फायदा
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें चाहे कितनी भी बढ़ें, भारत में खाद के दाम स्थिर रहेंगे। किसान अपनी फसल और मिट्टी के मुताबिक सही खाद चुन सकेंगे बिना ज्यादा खर्च के। घरेलू उत्पादन भी तेजी से बढ़ रहा है – 2014 में जहां 112 लाख टन खाद बनती थी, अब 2025 के अंत तक 168 लाख टन हो जाएगी। ये आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है। सरकार कंपनियों पर नजर रख रही है कि कोई अनुचित दाम न वसूले।
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