मटर की खेती का पूरा फॉर्मूला: सही बीज, उर्वरक और बुवाई से बढ़ेगी बंपर पैदावार

Matar Ki Kheti Tips: रबी सीजन की रौनक शुरू हो चुकी है। गेहूं और सरसों के साथ-साथ दलहन फसलें भी किसानों की पसंद बनी हुई हैं। इनमें मटर सबसे आगे है, क्योंकि ये न सिर्फ पौष्टिक है, बल्कि बाजार में इसकी मांग हमेशा रहती है। हरी फलियों के लिए या दाल बनाने के लिए मटर हर घर की जरूरत है। अगर सही तरीके से खेती की जाए, तो एक हेक्टेयर से 70 से 120 क्विंटल तक हरी फलियां मिल सकती हैं। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में नवंबर की शुरुआत मटर बोने का सही समय है। ठंडे मौसम में ये फसल अच्छी तरह पनपती है, और पाले से बचाव के साथ पैदावार दोगुनी हो सकती है।

खेत की तैयारी

मटर को भुरभुरी दोमट मिट्टी पसंद है, जहां पानी जमा न हो और हवा का संचार अच्छा रहे। खेत में गहरी जुताई यानी पलेवा करें, ताकि पुरानी जड़ें और खरपतवार निकल जाएं। अंकुरण के लिए 22 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श है, जबकि पौधे की बढ़वार 13 से 18 डिग्री पर सबसे अच्छी होती है। पाला मटर की सबसे बड़ी दुश्मन है, खासकर फूल आने के समय। इससे बचाने के लिए खेत में हल्की सिंचाई करें और पौधों के बीच उचित फासला रखें। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में अक्टूबर के आखिर से नवंबर मध्य तक बोनी करें, ताकि फरवरी-मार्च में तुड़ाई हो जाए।

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बीज की मात्रा और उपचार

शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 100 से 120 किलोग्राम बीज पर्याप्त है। मध्यम या देर से पकने वाली किस्मों में 80 से 90 किलोग्राम काफी होता है। बोनी से पहले बीज को थायरम 3 ग्राम प्रति किलो या बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलो से उपचारित करें, ताकि फफूंद से बचाव हो। इसके बाद राइजोबियम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम से उपचार करें, जो जड़ों में नाइट्रोजन फिक्स कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाएगा। प्रमाणित बीज ही लें, ताकि अंकुरण 90 प्रतिशत से ऊपर रहे।

बोनी की दूरी और गहराई

शीघ्र पकने वाली किस्मों में पंक्ति से पंक्ति 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे 5 से 6 सेंटीमीटर दूरी रखें। मध्यम या देर से पकने वाली किस्मों में पंक्ति 45 सेंटीमीटर और पौधे 8 से 10 सेंटीमीटर। खेत में पलेवा देकर बतर आने पर 5 से 7 सेंटीमीटर गहराई पर बोनी करें। लाइन में बोने से सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण आसान होता है। अगर मशीन से बो रहे हैं, तो ड्रिल का इस्तेमाल करें।

खाद और उर्वरक

खेत तैयार करते समय 20 टन अच्छी सड़ी गोबर खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं। बोनी के समय 40 किलोग्राम यूरिया, 375 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 50 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोनी पर और बाकी पहली सिंचाई के समय दें। अगर मिट्टी में जिंक की कमी है, तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट मिलाएं। जैविक खेती में वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल करें।

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मटर के उन्नत किस्में

पूसा प्रगति नाम की किस्म पाउडरी मिल्ड्यू रोग से बचाव करती है। फलियां 9 से 10 सेंटीमीटर लंबी होती हैं, हर फली में 8 से 10 दाने। पहली तुड़ाई 60 से 65 दिन में शुरू हो जाती है, और उपज 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी फलियां।

पीएलएम-3 में भी फलियां 8 से 10 सेंटीमीटर लंबी होती हैं, हर फली में 8 से 10 दाने। पहली तुड़ाई 60 से 65 दिन में हो जाती है। इसकी उपज 90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी फलियां तक पहुंच सकती है।

जवाहर मटर-3 में फलियां 6 से 7 सेंटीमीटर लंबी होती हैं, हर फली में 7 दाने तक। ये किस्म टी-19 और अर्लीबेजर के क्रॉस से बनी है। उपज 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी फलियां।

जवाहर मटर-4 बोनी से 75 दिन में तैयार हो जाती है। फलियां 7 सेंटीमीटर लंबी, हर फली में 6 दाने। इसमें प्रोटीन की मात्रा 28.7 प्रतिशत तक होती है।

जवाहर मटर-1 जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय की देन है। तुड़ाई 70 से 80 दिन में शुरू हो जाती है। फली में 8 से 9 दाने, प्रोटीन 24.6 प्रतिशत और उपज 90 से 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी फलियां।

ये किस्में लोकल कृषि केंद्रों पर उपलब्ध हैं।

खरपतवार नियंत्रण

पलेवा से ज्यादातर खरपतवार निकल जाते हैं। रासायनिक तरीके से बोनी के 48 घंटे के अंदर पेंडीमिथालीन 3.3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। हाथ से निराई भी करें, खासकर 20-25 दिन बाद। इससे पौधों को पोषण पूरा मिलेगा।

सिंचाई और देखभाल

पहली सिंचाई बोनी के 25-30 दिन बाद, फिर फूल आने और फली बनने के समय। कुल 3-4 सिंचाई काफी हैं। कीटों के लिए नीम तेल या जैविक दवा का छिड़काव करें। पाले से बचाने के लिए सल्फर धुआं या हल्की सिंचाई रात में करें। तुड़ाई हरी फलियों के लिए 50-60 दिन में शुरू करें, और सूखी दाल के लिए पौधे पीले पड़ने पर।

मटर की खेती कम लागत में ज्यादा मुनाफा देती है। बाजार में हरी फलियां 2,000-3,000 रुपये प्रति क्विंटल बिकती हैं। सही तरीके से करें, तो आपकी कमाई चमक जाएगी। लोकल कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।

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  • Shashikant

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