करेला ऐसी नकदी फसल है जो बाजार में लगातार अच्छा भाव देती रहती है। डायबिटीज कंट्रोल, इम्यूनिटी बढ़ाने और पेट की कई समस्याओं से राहत देने के कारण इसकी मांग साल भर बनी रहती है। लेकिन अच्छी पैदावार और ज्यादा कमाई के लिए सही वैरायटी का चुनाव बहुत जरूरी है। आज हम बात कर रहे हैं काशी प्रतिष्ठा (Kashi Pratishtha) करेला वैरायटी की, जो ICAR-Indian Institute of Vegetable Research (IIVR), वाराणसी द्वारा विकसित की गई है। ये वैरायटी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती के लिए बहुत उपयुक्त है और NSC के प्रमाणित बीज से किसान भाई भरोसेमंद और ज्यादा उत्पादन ले सकते हैं।
काशी प्रतिष्ठा करेला वैरायटी की मुख्य विशेषताएं
काशी प्रतिष्ठा वैरायटी की सबसे बड़ी खासियत उसकी उच्च पैदावार है। अच्छी देखभाल और प्रबंधन से प्रति हेक्टेयर 200 से 220 क्विंटल तक उत्पादन आसानी से मिल जाता है, जो सामान्य वैरायटी से काफी बेहतर है। फल गहरे हरे रंग के, लंबे (16-18 सेमी या उससे ज्यादा), पतले और हल्की कड़वाहट वाले होते हैं। औसत फल का वजन 90 से 110 ग्राम तक रहता है। फल में माइल्ड प्रोजेक्शन (हल्की उभार) होती है, जो इसे बाजार में आकर्षक बनाती है। ये वैरायटी ग्रीष्मकालीन और खरीफ दोनों सीजन में अच्छी चलती है। पहली तुड़ाई बुवाई या रोपाई के 45 से 55 दिन में शुरू हो जाती है और कुल फसल चक्र 100 से 120 दिन का होता है।
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पाउडरी मिल्ड्यू (फफूंदी) और फ्रूट फ्लाई जैसे सामान्य रोगों के प्रति अच्छा प्रतिरोध होने से स्प्रे और दवा का खर्च कम होता है। फल लंबे, सीधे और चमकदार होने से मंडी में अच्छा दाम मिलता है। कड़वाहट संतुलित होने से घरेलू और होटल दोनों बाजार में डिमांड रहती है। ये वैरायटी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और अन्य इलाकों में बहुत सफल साबित हुई है।
बड़े पैमाने पर खेती के लिए भूमि और मौसम का चुनाव
करेला गर्म और आर्द्र जलवायु वाली फसल है। तापमान 25 से 35 डिग्री सेल्सियस आदर्श रहता है। ग्रीष्मकालीन फसल के लिए फरवरी-मार्च और खरीफ के लिए जून-जुलाई में बुवाई करें। भूमि बलुई दोमट या दोमट होनी चाहिए, जिसमें अच्छी जल निकासी हो और pH 6.0 से 7.5 के बीच रहे। खेत में गहरी जुताई करें और 10 से 15 टन गोबर खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर डालें। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जड़ें मजबूत होती हैं।
बीज की मात्रा, उपचार और बुवाई की विधि
प्रति हेक्टेयर 1.5 से 2 किलो बीज काफी होता है। NSC से प्रमाणित बीज लें ताकि अंकुरण दर 80-90 प्रतिशत से ज्यादा रहे। बीज को बाविस्टिन या कैप्टान (2 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें। बुवाई के दो मुख्य तरीके हैं। पहला सीधी बुवाई, जिसमें पंक्ति से पंक्ति 2 से 3 मीटर और पौधे से पौधे 60 से 90 सेमी की दूरी रखें। गड्ढों में 2-3 बीज डालें और बाद में पतला करें। दूसरा तरीका नर्सरी से रोपाई है। नर्सरी में बीज बोकर 20 से 25 दिन में पौधे तैयार करें और रोपाई के समय 1.5 से 2 मीटर x 60 सेमी दूरी रखें। इससे पौधे मजबूत होते हैं और पैदावार ज्यादा मिलती है।
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सिंचाई, खाद प्रबंधन और सहारा देना
पहली सिंचाई बुवाई के 7 से 10 दिन बाद करें। फूल आने तक हल्की सिंचाई और फल बनने पर नियमित लेकिन ज्यादा पानी न दें, वरना जड़ें सड़ सकती हैं। खाद के लिए रोपाई से पहले 80 से 100 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फॉस्फोरस और 60 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर दें। आधी खाद बेसल में और बाकी टॉप ड्रेसिंग में डालें। फूल आने पर पोटाश ज्यादा दें ताकि फल मोटे और ज्यादा लगें। करेला बेल वाली फसल है, इसलिए जाली, बांस या तार का मजबूत सहारा जरूर दें। इससे फल साफ, सीधे और सूरज की रोशनी से बचते हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग या हैंड वीडिंग करें।
कीट-रोग प्रबंधन और तुड़ाई का समय
फ्रूट फ्लाई से बचाव के लिए फेरोमोन ट्रैप या नीम आधारित स्प्रे और पाउडरी मिल्ड्यू के लिए सल्फर या जैविक फफूंदनाशक का उपयोग करें। इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट अपनाने से रासायनिक दवा कम लगती है। तुड़ाई फल 8 से 10 इंच लंबे होने पर हर 2 से 3 दिन में करें। ज्यादा बड़े होने से कड़वाहट बढ़ती है और बाजार में कम दाम मिलता है। सही समय पर तुड़ाई से नया फल जल्दी आता है। अच्छी पैदावार से 200 से 220 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आसानी से मिल सकती है। बाजार में भाव 20 से 50 रुपये प्रति किलो तक रहता है, तो अच्छा मुनाफा होता है।
NSC से प्रमाणित बीज कैसे प्राप्त करें
NSC सरकारी कंपनी है, इसलिए बीज प्रमाणित और भरोसेमंद मिलते हैं। काशी प्रतिष्ठा के 5 ग्राम पैकेट मात्र 35 रुपये में उपलब्ध हैं। बड़े पैमाने पर खेती के लिए 1-2 किलो या ज्यादा मात्रा में ऑर्डर करें। ऑनलाइन ऑर्डर करने के लिए लिंक: https://mystore.in/en/product/nsc-bitter-gourd-kashi-pratistha-seed
भाइयो, काशी प्रतिष्ठा से बड़े खेत में करेला उगाकर अच्छी कमाई कर सकते हैं। ये वैरायटी वैज्ञानिक रूप से विकसित है, बाजार में डिमांड वाली है और कम खर्च में ज्यादा उत्पादन देती है।
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