Barley Farming Tips: रबी सीजन में जौ की फसल कई किसान भाइयों की पहली पसंद बन रही है। ये फसल कम पानी में अच्छी पैदावार देती है, लागत कम लगती है और मोटे अनाजों को बढ़ावा देने की सरकारी नीति से इसका भविष्य भी तय है। लेकिन जौ तेजी से बढ़वार वाली फसल है, अगर सिंचाई का सही प्रबंधन न हो या खरपतवारों पर काबू न पाया जाए तो पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को चेतावनी दी है कि इस समय छोटी-छोटी गलतियों से बचें, वरना पैदावार और दाने की क्वालिटी दोनों प्रभावित हो सकती हैं। अच्छी बात ये है कि सही तरीके अपनाकर सीमित संसाधनों में भी शानदार उपज ली जा सकती है।
जौ की खेती उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में खूब हो रही है। ये फसल गेहूं की तरह ज्यादा पानी नहीं मांगती और क्षारीय या लवणीय जमीन में भी अच्छा करती है। सरकार ने भी जौ को प्रोत्साहन देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP बढ़ाकर 2150 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। ये पिछले साल से 170 रुपये ज्यादा है, जिससे किसानों की जेब भरने की उम्मीद जग गई है। लेकिन फसल को सफल बनाने के लिए जल प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा।
पानी का सही इस्तेमाल करें
जौ की सबसे बड़ी ताकत ये है कि ये कम पानी में पनप जाती है। सामान्य हालात में सिर्फ दो से तीन सिंचाई ही काफी होती हैं। कई किसान भाई पूछते हैं कि अगर सिर्फ एक ही पानी उपलब्ध हो तो कब दें? विशेषज्ञों का साफ जवाब है – बुआई के 30 से 35 दिन बाद, जब कल्ले बनने की अवस्था आती है। इस समय दिया गया पानी फसल को नई ताकत देता है और दाने अच्छे भरते हैं।
अगर दो सिंचाई कर सकते हैं तो पहली बुआई के 25 से 30 दिन बाद कल्ले फूटने के समय और दूसरी 65 से 70 दिन बाद बाली आने की स्टेज में दें। इससे पौधे मजबूत बनते हैं और पैदावार बढ़ती है। खासकर क्षारीय या नमकीन जमीन वाले इलाकों में भारी पानी न देकर हल्की सिंचाई ज्यादा बार करें। ज्यादा पानी खड़ा रहेगा तो जड़ें सड़ सकती हैं।
एक जरूरी टिप ये भी है कि हर सिंचाई के बाद नाइट्रोजन की बाकी आधी मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रूप में जरूर डालें। मतलब प्रति हेक्टेयर 66 किलोग्राम यूरिया छिटकाव करें। इससे पौधे हरे-भरे रहते हैं और दाने भारी बनते हैं। कई किसान ये भूल जाते हैं और बाद में पछताते हैं कि फसल पीली पड़ गई।
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खरपतवारों को न पनपने दें
जौ की फसल तो तेजी से बढ़ती है और खुद ही खरपतवारों को दबा लेती है, लेकिन अगर खेत में जंगली जई, गुल्ली-डंडा, बथुआ या जंगली गाजर जैसे खरपतवार ज्यादा हो गए तो मुसीबत हो जाती है। ये खरपतवार पौधों से पोषक तत्व चुरा लेते हैं और उपज कम कर देते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बुआई के 30 से 35 दिन बाद ही खरपतवारों पर अंकुश लगाएं।
संकरी पत्ती वाले खरपतवार जैसे जंगली जई और गुल्ली-डंडा के लिए पेंडीमेथिलिन या आइसोप्रोट्यूरॉन दवा का छिड़काव करें। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार बथुआ या जंगली गाजर के लिए 2,4-डी आधारित खरपतवारनाशक सबसे कारगर हैं। ये दवाएं सस्ती और आसानी से उपलब्ध होती हैं। समय पर स्प्रे कर देंगे तो खेत साफ रहेगा और जौ के पौधे पूरी ताकत से बढ़ेंगे। कई किसान देर कर देते हैं, तब तक खरपतवार मजबूत हो जाते हैं और दवा का असर कम हो जाता है।
MSP में बड़ी बढ़ोतरी से किसानों में खुशी की लहर
इस बार जौ की खेती और भी फायदेमंद हो गई है क्योंकि केंद्र सरकार ने रबी 2026-27 के लिए MSP 2150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। ये बढ़ोतरी किसानों के लिए बड़ा तोहफा है। बाजार में दाम गिरें तो भी सरकार खरीद करेगी और पूरा पैसा मिलेगा। मोटे अनाजों को बढ़ावा देने की नीति से जौ का रकबा बढ़ रहा है और किसानों की आय मजबूत हो रही है। पोषण के लिहाज से भी जौ बेहतरीन है, इसमें फाइबर और मिनरल्स भरपूर होते हैं।
किसान भाइयों, अगर आप जौ उगा रहे हैं या अगले साल प्लान कर रहे हैं तो ये टिप्स जरूर अपनाएं। कम पानी, कम लागत और अच्छी कमाई – जौ की खेती इसी का नाम है। अपने इलाके के कृषि अधिकारी या विश्वविद्यालय से भी संपर्क करके नई किस्मों की जानकारी लें।
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