Dragon fruit farming: ड्रैगन फ्रूट जिसे पिताया या कमलम भी कहा जाता है, कैक्टस परिवार का पौधा है जो मूल रूप से मध्य अमेरिका से आया लेकिन अब भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह फसल कम पानी वाली जगहों और सूखे इलाकों के लिए उपयुक्त है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों की रिपोर्ट्स के अनुसार, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक सहित कई राज्यों में इसकी खेती सफलतापूर्वक हो रही है।
बाजार में इसकी मांग स्वास्थ्य लाभों के कारण बढ़ रही है। एक बार पौध रोपण करने पर 20-25 साल तक उत्पादन मिलता रहता है। तीसरे साल से पूर्ण उत्पादन शुरू हो जाता है और एक हेक्टेयर से 20-40 टन तक फल प्राप्त किया जा सकता है।

ड्रैगन फ्रूट की जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएं
यह फसल गर्म और उप-आर्द्र जलवायु में अच्छी तरह उगती है। तापमान 20-35 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त रहता है। पाला या कड़ाके की सर्दी सहन नहीं कर पाती। कम बारिश वाले क्षेत्रों में भी सफल होती है क्योंकि यह कैक्टस प्रजाति का पौधा है। मिट्टी बलुई दोमट या दोमट होनी चाहिए जिसमें जल निकास अच्छा हो। मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 7.5 के बीच रखें। ज्यादा पानी रुकने से जड़ें सड़ सकती हैं इसलिए ऊँची क्यारियाँ बनाना बेहतर रहता है।
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उन्नत और प्रमाणित किस्मों का चयन
भारत में मुख्य रूप से चार प्रकार की किस्में उगाई जा रही हैं। सफेद गूदा वाली किस्म (हाइलोसेरियस उन्डेटस) सबसे ज्यादा लोकप्रिय है जिसमें छिलका गुलाबी और गूदा सफेद होता है। लाल गूदा वाली किस्म (हाइलोसेरियस कोस्टारिसेंसिस या पोलिराइजस) स्वाद में मीठी और बाजार में महँगी बिकती है। गुलाबी गूदा वाली तथा पीली छिलका वाली किस्म (हाइलोसेरियस मेगालैंथस) भी उपलब्ध है जो निर्यात के लिए उपयुक्त है। 2025 की नवीनतम सिफारशों में थाई रेड, वियतनाम जंबो, अमेरिकन ब्यूटी, सियाम रेड और यलो वैरायटी शामिल हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने रेड ड्रैगन 1 और व्हाइट ड्रैगन 1 को प्रमाणित किया है। अच्छी नर्सरी से कलमी पौधे ही चुनें।

खेत तैयार करना और पौध रोपण की विधि
खेत की गहरी जुताई करें और प्रति हेक्टेयर 10-15 टन सड़ी गोबर खाद मिलाएं। पौधों को सहारा देने के लिए कंक्रीट के खंभे (4-5 फीट ऊँचे) या लकड़ी के पोल लगाएं। दूरी 3 मीटर x 2 मीटर रखें जिससे प्रति हेक्टेयर 1600-2000 पौधे लग जाते हैं। रोपण कटिंग से करें क्योंकि इससे 12-18 महीने में फल शुरू हो जाते हैं। कटिंग 30-40 सेमी लंबी लें और 2-3 दिन छाया में सुखाकर लगाएं। फरवरी-मार्च या जून-जुलाई में रोपण उपयुक्त रहता है। ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था जरूर करें क्योंकि इससे पानी की बचत होती है।
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खाद, पानी और देखभाल का प्रबंधन
पौध रोपण के समय एनपीके 10:26:26 जैसी संतुलित खाद दें। बाद में हर साल गोबर खाद या वर्मी कंपोस्ट 10-15 टन प्रति हेक्टेयर डालें। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश संतुलित मात्रा में दें। गर्मी में 10-15 दिन के अंतर पर पानी दें लेकिन बारिश में पानी रुकने न दें। खरपतवार नियंत्रण के लिए शुरुआती 2 साल निराई करें उसके बाद पौधा खुद दबा लेता है। कीटों से बचाव के लिए नीम आधारित दवाएं या जैविक कीटनाशक इस्तेमाल करें। बेलों को खंभों पर नियमित बाँधें और पुरानी टहनियाँ काटते रहें। गर्मी में सनबर्न से बचाने के लिए 25-30 प्रतिशत छाया दें।

फल आने का समय, कटाई और उत्पादन
रोपण के 12-18 महीने बाद फल शुरू हो जाते हैं। फल रात में खिलते हैं और 30-50 दिन में पक जाते हैं। जब छिलका पूरी तरह रंगीन और फल हल्का नरम हो जाए तब हाथ से तोड़ें। एक साल में 6-8 बार कटाई होती है। तीसरे साल से प्रति हेक्टेयर 20-40 टन उत्पादन मिल सकता है। अच्छी देखभाल से एक पौधे से 15-20 किलो फल आसानी से प्राप्त हो जाता है।

बाजार भाव, कमाई और सरकारी सहायता
2025 में ड्रैगन फ्रूट का थोक भाव 150-300 रुपये प्रति किलो और खुदरा में 400-500 रुपये तक चल रहा है। लाल और पीली किस्में अधिक महँगी बिकती हैं। एक एकड़ से तीसरे साल के बाद 10-25 लाख रुपये तक की शुद्ध कमाई संभव है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत ड्रिप सिंचाई और पौधों पर 40-50 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। कई राज्यों में अलग से अनुदान उपलब्ध है। निर्यात की संभावना भी बढ़ रही है। स्थानीय कृषि विभाग से संपर्क करके सब्सिडी और मार्गदर्शन प्राप्त करें।
ड्रैगन फ्रूट की खेती सूखा प्रभावित क्षेत्रों में आय का स्थिर स्रोत बन सकती है। वैज्ञानिक विधि अपनाकर और अच्छी किस्मों का चयन करके किसान अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
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मै धर्मेन्द्र एक कृषि विशेषज्ञ हूं जिसे खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी साझा करना और नई-नई तकनीकों को समझना बेहद पसंद है। कृषि से संबंधित लेख पढ़ना और लिखना मेरा जुनून है। मेरा उद्देश्य है कि किसानों तक सही और उपयोगी जानकारी पहुंचे ताकि वे अधिक उत्पादन कर सकें और खेती को एक लाभकारी व्यवसाय बना सकें।