भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR), वाराणसी ने ऐसी अनोखी तोरई खोजी है जिसकी खुशबू बिल्कुल बासमती चावल जैसी है। यह खोज सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए ही नहीं, बल्कि सब्ज़ी उगाने वाले किसानों के लिए भी एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। संस्थान ने इस विशेष जीनोटाइप को औपचारिक रूप से ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR), नई दिल्ली में VRSG 7-17 कोड के नाम से रजिस्टर करा दिया है। अब इस किस्म के बीज तैयार कर इसे किसानों के लिए एक नई वैरायटी के रूप में जारी करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
इस तोरई की सबसे बड़ी खासियत इसकी खुशबू है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसमें वही विशेष कंपाउंड पाया गया है, जो बासमती चावल को उसकी अलग पहचान देता है। यही वजह है कि यह तोरई पकाने या उबालने के बाद भी अपनी प्राकृतिक सुगंध बनाए रखती है। सब्ज़ियों में पहली बार ऐसी किस्म देखने को मिल रही है, जिससे मार्केट में इसकी मांग काफी बढ़ने की उम्मीद है।
VRSG 7-17 की खेती भी आसान है और इसकी बेल पर फल आने में ज्यादा समय नहीं लगता। बुवाई के लगभग 52 से 60 दिन के भीतर तोरई तैयार होने लगती है, इसलिए यह जल्दी पकने वाली किस्मों में गिनी जाएगी। किसान एक सीजन में इससे ज्यादा उत्पादन लेकर बेहतर कमाई कर सकते हैं। इस तोरई का रंग हल्का हरा होता है, जो ग्राहकों की पसंद के अनुरूप है। औसतन इसकी फल लंबाई 27.46 सेंटीमीटर, डायमीटर लगभग 3.35 सेंटीमीटर और एक फल का वजन करीब 156.5 ग्राम मापा गया है। हर पौधा लगभग 1.13 किलो तक उपज देता है, जो इसकी श्रेणी में काफी अच्छा माना जाता है।
IIVR के वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे ही बीज उत्पादन पूरा हो जाएगा, इसे किसानों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। यह नई वैरायटी सब्ज़ी उत्पादकों को बाजार में एक अलग पहचान दिला सकती है, क्योंकि बासमती जैसी खुशबू वाली सब्ज़ियाँ उपभोक्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं। वाराणसी की यह खोज आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो सकती है और किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का मौका भी।
किसानों के लिए यह संदेश साफ है कि आने वाले सीजन में एक नई, सुगंधित और जल्दी तैयार होने वाली तोरई उनकी फसल सूची में शामिल होने जा रही है। IIVR की यह उपलब्धि सब्ज़ी जगत में एक नई दिशा खोल सकती है, और उम्मीद है कि इसकी मांग बासमती चावल की तरह ही तेजी से बढ़ेगी।
ये भी पढ़ें- गेहूं में कम जमाव से हैं परेशान? पहली सिंचाई के बाद इस विधि से गैप फिलिंग से बचाइए अपनी 25% पैदावार