धान में फॉल्स स्मट बीमारी: बौना वायरस के बाद नया खतरा, पैदावार पर मंडरा रहा संकट

किसान धान की कटाई की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन कुछ इलाकों में नई मुसीबत ने सिर उठा लिया है। बौना वायरस और बेमौसम बारिश के बाद अब फॉल्स स्मट नामक फफूंद रोग धान की फसल पर हमला कर रहा है। अंबाला और कुरुक्षेत्र के खेतों में इस बीमारी के लक्षण दिखने से किसान चिंतित हैं। यह रोग फूल आने के समय फसल को प्रभावित करता है, जिससे अनाज की गुणवत्ता खराब होती है और पैदावार में कमी आती है। कुरुक्षेत्र के असंधपुर गांव के किसान गुरलाल सिंह ने बताया कि इस साल नुकसान की आशंका है, क्योंकि बीमारी का प्रकोप पहले से ज्यादा लग रहा है।

फॉल्स स्मट बीमारी क्या है?

फॉल्स स्मट एक फफूंद जनित रोग है, जो यूस्टिलागिनोइडिया विरेंस नामक कवक के कारण होता है। यह धान के फूलों पर हमला करता है और चावल के दानों को सफेद या हरे रंग की गेंद जैसी संरचना में बदल देता है। शुरुआती लक्षणों में चावल के पुष्प (स्पाइकलेट्स) पर सफेद या क्रीम रंग के छोटे-छोटे गांठें दिखाई देती हैं, जो बाद में हरे या काले हो जाती हैं।

यह बीमारी नम और गर्म मौसम में तेजी से फैलती है, खासकर बेमौसम बारिश के बाद। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह रोग धान की संकर किस्मों पर सबसे ज्यादा असर डालता है, क्योंकि इनकी संरचना अधिक संवेदनशील होती है। हरियाणा में बरारा, नारायणगढ़, साहा और मानेसर क्षेत्रों में लगभग 600 एकड़ फसल प्रभावित हो चुकी है।

कैसे पहचानें?

इस बीमारी के मुख्य कारण नमी भरी जलवायु, खराब जल निकास वाले खेत और संक्रमित बीज हैं। बौना वायरस के बाद बेमौसम बारिश ने मिट्टी को गीला रखा, जिससे फफूंद का प्रसार आसान हो गया। लक्षणों में फूलों पर सफेद पाउडर जैसा पदार्थ दिखना, दाने काले पड़ना और पुष्प झड़ना शामिल है। प्रभावित दाने खाली या सिकुड़े हुए हो जाते हैं, जिससे मिलिंग के दौरान ब्रोकरन (टूटे चावल) की मात्रा बढ़ जाती है। किसान जसबीर सिंह ने बताया कि उन्होंने स्प्रे आजमाए, लेकिन बारिश के कारण समय पर छिड़काव नहीं हो सका। अगर समय पर पहचान न हो, तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।

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पैदावार पर असर

फॉल्स स्मट का सबसे बड़ा नुकसान पैदावार में होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रभावित फसल में 10-30% तक उपज घट सकती है, और अनाज की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि बाजार मूल्य 20-40% कम मिलता है। कुरुक्षेत्र के किसान गुरलाल सिंह का कहना है कि इस साल भारी नुकसान की आशंका है, क्योंकि रोग हर साल तो आता है, लेकिन इस बार प्रकोप ज्यादा है। संकर किस्मों जैसे पीआर 114 या एचएचएच 44 पर इसका असर सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। इससे किसानों की आय प्रभावित हो रही है, और मिलिंग उद्योग को भी नुकसान हो रहा है।

क्या करें किसान?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि फॉल्स स्मट को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन सावधानी से नुकसान कम किया जा सकता है। सबसे पहले, स्वस्थ और प्रमाणित बीज चुनें। बुवाई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोनाजोल से उपचारित करें। खेत में अच्छा जल निकास सुनिश्चित करें और बेमौसम बारिश के बाद तुरंत पानी निकालें।

फूल आने के समय (बुवाई के 60-80 दिन बाद) फफूंदनाशक जैसे प्रोपिकोनाजोल या टेबुकोनाजोल का छिड़काव करें, लेकिन मौसम साफ होने पर ही। अंबाला के कृषि उपनिदेशक डॉ. जसविंदर सैनी ने सलाह दी है कि कटाई शुरू होने वाली फसल पर स्प्रे न करें, क्योंकि इससे रंग खराब हो सकता है। इसके अलावा, फसल चक्रण अपनाएं और संकर किस्मों के बजाय प्रतिरोधी किस्में जैसे साहभागी या पूसा 44 चुनें।

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स्प्रे से बचें

कुरुक्षेत्र के कृषि उपनिदेशक करमचंद ने किसानों को चेतावनी दी है कि प्रभावित खेतों पर स्प्रे न करें, क्योंकि इससे रोग फैल सकता है और फसल का रंग बिगड़ सकता है। कटाई 5-10 दिनों में होने वाली फसल को स्पर्श न करें। इसके बजाय, गिरदावरी करवाकर नुकसान का आकलन करें। भारतीय किसान यूनियन के प्रिंस वड़ैच ने मांग की है कि सरकार मुआवजा दे, क्योंकि बौना वायरस, जलभराव और फॉल्स स्मट से किसानों को तीनहरी मार पड़ी है। कृषि विभाग ने हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं, जहां किसान सलाह ले सकते हैं।

यह बीमारी धान उत्पादन को प्रभावित कर रही है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसानों को जागरूक रहना होगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए नई तकनीकों को अपनाना होगा। वैज्ञानिक अनुसंधान से प्रतिरोधी किस्में विकसित हो रही हैं, लेकिन फिलहाल सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप धान की खेती कर रहे हैं, तो स्थानीय कृषि केंद्र से संपर्क करें और समय पर कदम उठाएं। इस तरह नुकसान को कम करके अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है।

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  • Shashikant

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