गेहूं भारत में रबी सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल है, और देश के लाखों किसान इस पर निर्भर हैं। कम लागत में अधिकतम पैदावार और आय बढ़ाने के लिए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR), करनाल ने करण वैष्णवी DBW 303 नामक उन्नत किस्म विकसित की है। यह किस्म रिकॉर्ड 97.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की अधिकतम उपज देती है, जो मौजूदा लोकप्रिय किस्मों से कहीं आगे है।
2021 में केंद्रीय किस्म विमोचन समिति द्वारा अधिसूचित यह किस्म उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों के सिंचित खेतों में अगेती बुवाई के लिए डिज़ाइन की गई है। यह पीला, भूरा, काला रतुआ, करनाल बंट और गेहूं ब्लास्ट जैसे रोगों के प्रति मजबूत प्रतिरोधकता प्रदान करती है। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह किस्म सूखा और उच्च तापमान सहनशीलता के साथ किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करती है।
रिकॉर्ड तोड़ उपज
IIWBR, करनाल के वैज्ञानिकों ने अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत करण वैष्णवी DBW 303 को विकसित किया है। अखिल भारतीय परीक्षणों में इसकी औसत उपज 81.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही, जो एचडी-2967 से 30.3 प्रतिशत और एचडी-3086 से 11.7 प्रतिशत अधिक है। उत्पादन परीक्षणों में इसने 97.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की रिकॉर्ड पैदावार दी। पूरे उत्तर पश्चिमी जोन में इसकी पैदावार स्थिर रहती है, और उच्च उर्वरक व वृद्धि नियंत्रकों के उपयोग से यह और बेहतर परिणाम देती है।
यह किस्म उच्च तापमान और सूखे की स्थिति में भी मजबूती से खड़ी रहती है, जिससे यह बदलते मौसम में किसानों के लिए भरोसेमंद है। इसके दाने बोल्ड, एम्बर रंग के, हार्ड और चमकदार होते हैं, जो बाजार में प्रीमियम मूल्य दिलाते हैं। पौधे की ऊंचाई 101 सेंटीमीटर है, जो लॉजिंग की समस्या को कम करती है।
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रोग प्रतिरोध और पोषण गुणवत्ता
करण वैष्णवी DBW 303 रोग प्रतिरोधकता के मामले में बेजोड़ है। यह पीला, भूरा और काला रतुआ के सभी प्रमुख रोगजनकों के प्रति प्रतिरोधी है। करनाल बंट रोग की घटना इसमें मात्र 4.2 प्रतिशत रहती है, जो अन्य किस्मों से काफी कम है। गेहूं ब्लास्ट रोग के प्रति भी यह अत्यधिक रोगरोधिता दिखाती है। प्राकृतिक और कृत्रिम संक्रमण परीक्षणों में स्ट्राइप और लीफ रस्ट के लिए इसकी ACI वैल्यू न्यूनतम रही है। पोषण के लिहाज से इसके दानों में प्रोटीन की मात्रा 12.1 प्रतिशत है, जो कुपोषण से लड़ने में मददगार है।
चपाती स्कोर 7.9, ब्रेड स्कोर 6.4/10, और बिस्कुट फैलाव गुणांक 6.7 सेंटीमीटर है। गीला ग्लूटन 34.9 प्रतिशत और सूखा ग्लूटन 11.3 प्रतिशत होने से यह चपाती, ब्रेड और बिस्कुट जैसे उत्पादों के लिए आदर्श है। अवसादन मूल्य 64.8 ml होने से आटा उच्च गुणवत्ता का बनता है। बालियां 101 दिनों में निकलने लगती हैं, और फसल 156 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। 1000 दानों का वजन 42 ग्राम है।
उपयुक्त क्षेत्र और जलवायु
यह किस्म उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों के सिंचित खेतों में अगेती बुवाई के लिए अनुशंसित है। इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान के अधिकांश हिस्से (कोटा और उदयपुर डिवीजन को छोड़कर), पश्चिमी उत्तर प्रदेश (झांसी डिवीजन को छोड़कर), जम्मू-कश्मीर के जम्मू और कठुआ जिले, हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला और पांवटा घाटी, तथा उत्तराखंड के तराई क्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों में इसकी स्थिर पैदावार और रोग प्रतिरोधकता इसे किसानों की पहली पसंद बनाती है। यह 20-25 डिग्री सेल्सियस तापमान में अच्छी तरह बढ़ती है, और अगेती बुवाई से रोगों का खतरा कम होता है।
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बुवाई और खेती की वैज्ञानिक विधि
करण वैष्णवी DBW 303 की बुवाई का सबसे अच्छा समय 25 अक्टूबर से 5 नवंबर तक है। इस दौरान तापमान अंकुरण और प्रारंभिक विकास के लिए अनुकूल रहता है। बुवाई के लिए 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर उपयोग करें और पंक्तियों के बीच 20 सेंटीमीटर दूरी रखें। मिट्टी दोमट या बलुई दोमट होनी चाहिए, जिसका pH 6.0 से 7.5 तक हो। खेत की तैयारी में 2-3 बार गहरी जुताई करें और 100-150 क्विंटल सड़ी गोबर खाद या वर्मीकम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर मिलाएं।
उर्वरक के रूप में नाइट्रोजन 120-150 किलोग्राम, फॉस्फोरस 60-80 किलोग्राम, और पोटाश 40-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दें। आधा नाइट्रोजन और पूरा फॉस्फोरस-पोटाश बुवाई के समय मिलाएं, बाकी नाइट्रोजन 30 और 60 दिन बाद दो हिस्सों में दें। कंडुवा रोग से बचाव के लिए बीज को विटावैक्स (कार्बोक्सिन 37.5% + थिरम 37.5%) से 2-3 ग्राम प्रति किलोग्राम उपचारित करें। ड्रिल विधि से बुवाई करें ताकि अंकुरण एकसमान हो और बीज की बचत हो।
सिंचाई और देखभाल की तकनीक
इस किस्म को 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 20-25 दिन बाद करें, फिर उपलब्ध नमी के आधार पर 25-35 दिनों के अंतराल पर। फूल आने और दाना बनने के चरण में सिंचाई विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन जलभराव से बचें क्योंकि यह जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 25-30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करें। पेंडीमेथालिन जैसे खरपतवारनाशक का सीमित उपयोग करें। इसकी रोग प्रतिरोधकता के कारण रासायनिक छिड़काव की जरूरत कम पड़ती है, लेकिन आवश्यकता होने पर मैनकोजेब या प्रोपिकोनाजोल का छिड़काव करें। कीटों जैसे एफिड्स के लिए इमिडाक्लोप्रिड का उपयोग प्रभावी है। जैविक खेती अपनाने वाले किसान नीम तेल या ट्राइकोडर्मा का उपयोग करें।
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कटाई और आर्थिक लाभ
करण वैष्णवी DBW 303 156 दिनों में पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई तब करें जब पौधे पीले पड़ने लगें और दाने सख्त हो जाएं। समय पर कटाई से बीज झड़ने का नुकसान नहीं होता। औसत उपज 81.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (32.5 क्विंटल/एकड़) और अधिकतम 97.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (39 क्विंटल/एकड़) तक हो सकती है।
बाजार मूल्य 2200-2500 रुपये प्रति क्विंटल होने पर प्रति हेक्टेयर आय 1.8-2.4 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। प्रति हेक्टेयर लागत 40,000-50,000 रुपये होने पर शुद्ध लाभ 1.3-1.9 लाख रुपये तक संभव है। प्रोटीन और ग्लूटन युक्त दाने बाजार में प्रीमियम मूल्य दिलाते हैं। कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर ठंडी, सूखी जगह पर भंडारित करें ताकि गुणवत्ता बनी रहे।
बीज कहां से लें
करण वैष्णवी DBW 303 के बीज भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल, राष्ट्रीय बीज निगम (NSC), या स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों से प्राप्त करें। सरकारी योजनाओं के तहत बीज सब्सिडी का लाभ उठाएं। बुवाई से पहले स्थानीय KVK या जिला कृषि कार्यालय से मिट्टी परीक्षण और सलाह लें।
किसानों के लिए सुनहरा अवसर
करण वैष्णवी DBW 303 उच्च उपज, रोग प्रतिरोधकता और बेहतर पोषण गुणवत्ता के साथ उत्तर भारत के किसानों के लिए एक क्रांतिकारी किस्म है। अगेती बुवाई, वैज्ञानिक देखभाल और उचित प्रबंधन से यह आय दोगुनी करने का सशक्त माध्यम है। इस रबी सीजन में इसे अपनाकर अपने खेत को समृद्ध बनाएं और आर्थिक मजबूती हासिल करें।
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