रबी सीजन की प्रमुख दलहनी फसल चना अब निर्णायक चरण में पहुंच रही है। लेकिन मौसम में उतार-चढ़ाव और कीटों के प्रकोप से पैदावार पर गंभीर असर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों की चेतावनी है कि तीन मुख्य कीट — फली छेदक, दीमक और कटुआ — फसल को तबाह कर सकते हैं। यदि समय पर निगरानी और उपाय न अपनाए गए तो उत्पादन में 30 से 60 प्रतिशत तक हानि संभव है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे चना उत्पादक राज्यों में किसानों को सतर्क रहने की जरूरत है।
फली छेदक कीट: सबसे बड़ा खतरा
फली छेदक (Helicoverpa armigera) चना का सबसे नुकसानदायक कीट माना जाता है। इसकी इल्लियां शुरुआत में पत्तियां और तने खाती हैं, लेकिन फली बनने पर फलियों में छेद करके दानों को नष्ट कर देती हैं। पैदावार में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। प्रारंभिक लक्षणों में फलियों पर छोटे छेद और बाहर लटकती इल्लियां दिखाई देती हैं।
दीमक: जड़ों से हमला
दीमक फसल को बुवाई से कटाई तक नुकसान पहुंचाती है। यह जड़ों और तनों को अंदर से खोखला कर देती है, जिससे पौधे पीले पड़कर सूख जाते हैं। खासकर कम नमी और सूखे क्षेत्रों में प्रकोप ज्यादा रहता है। इससे उत्पादन में 30 से 60 प्रतिशत तक हानि हो सकती है। लक्षणों में पौधों का अचानक मुरझाना और जड़ों में सफेद सुरंगें दिखाई देती हैं।
कटुआ कीट: अंकुरण चरण में नुकसान
कटुआ कीट रात में सक्रिय रहता है और पौधों को जमीन की सतह से काट देता है। इससे अंकुरण रुक जाता है और पौधों की संख्या कम हो जाती है। दिन में यह मिट्टी के ढेलों या घास के नीचे छिपा रहता है। शुरुआती चरण में फसल की घनत्व प्रभावित होती है, जिससे कुल पैदावार घट जाती है।
बचाव के प्रभावी उपाय
कीटों से बचाव के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) अपनाना सबसे अच्छा है। फली छेदक के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाएं, नीम आधारित जैविक कीटनाशकों का छिड़काव करें और मित्र कीटों (जैसे परजीवी मधुमक्खियां) को संरक्षित रखें। अधिक प्रकोप पर इंडोसल्फान 35 EC, क्विनालफॉस 20 EC या क्लोरोपाइरीफॉस 20 EC का अनुशंसित मात्रा में उपयोग करें। दीमक के लिए सड़ी गोबर खाद डालें, विवेरिया वैसियाना जैसी जैविक फफूंद का प्रयोग करें और सिंचाई जल में क्लोरोपाइरीफॉस मिलाकर डालें। कटुआ कीट के लिए खेत की मेड़ पर सूरजमुखी जैसी आकर्षक फसल बोएं, सूखी घास के ढेर बनाकर सुबह कीट नष्ट करें और लाइट ट्रैप लगाएं। नीम तेल का छिड़काव भी प्रभावी है।
खेतों की नियमित निगरानी करें। प्रारंभिक लक्षण दिखते ही उपाय अपनाएं। जैविक तरीकों को प्राथमिकता दें ताकि पर्यावरण और मिट्टी की सेहत बनी रहे।
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