जनवरी में बुवाई, मार्च में मुनाफा! काशी मोहिनी और पीतांबर तरबूज से बढ़ेगी किसानों की आमदनी

इस बार तरबूज की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR द्वारा विकसित उन्नत किस्मों की वजह से तरबूज की खेती अब पहले से कहीं ज्यादा मुनाफे वाली साबित हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जनवरी महीने से तरबूज की बुवाई शुरू हो जाती है और अगर किसान सही किस्मों का चयन कर लें, तो कम लागत में ज्यादा उत्पादन लेकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। खास बात यह है कि जनवरी में बोई गई फसल मार्च-अप्रैल में तैयार हो जाती है, जब बाजार में तरबूज की मांग तेजी से बढ़ने लगती है और दाम भी अच्छे मिलते हैं।

ICAR के अंतर्गत आने वाले भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी यानी IIVR ने तरबूज की कुछ उन्नत किस्में विकसित की हैं, जो स्वाद, मिठास और उत्पादन के मामले में सामान्य किस्मों से काफी बेहतर मानी जा रही हैं। इनमें काशी मोहिनी और काशी पीतांबर किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है और फल की गुणवत्ता बाजार की मांग के अनुसार होती है।

काशी मोहिनी और काशी पीतांबर क्यों हैं किसानों की पहली पसंद

काशी मोहिनी किस्म लगभग 75 से 80 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके फल का गूदा गहरा लाल रंग का होता है और मिठास काफी ज्यादा होती है, जिससे यह बाजार में जल्दी बिक जाती है। व्यापारी इस किस्म के तरबूज को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि इसका स्वाद और आकार दोनों ग्राहकों को पसंद आते हैं। वहीं काशी पीतांबर किस्म भी अपनी एकरूपता, अच्छी शेल्फ लाइफ और आकर्षक फल के कारण किसानों को बेहतर दाम दिलाने में मदद करती है।

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक सही देखभाल और वैज्ञानिक तरीके अपनाने पर इन उन्नत किस्मों से प्रति हेक्टेयर 40 से 60 टन तक उपज लेना संभव है। यही वजह है कि अब बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक किस्मों को छोड़कर ICAR द्वारा अनुशंसित इन उन्नत बीजों की ओर रुख कर रहे हैं। शुरुआती सीजन में जब बाजार में तरबूज की आवक कम होती है, उस समय इन किस्मों से तैयार फसल किसानों को सीधा फायदा पहुंचाती है।

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जनवरी की बुवाई क्यों देती है ज्यादा मुनाफा

जनवरी से तरबूज की बुवाई शुरू करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फसल मार्च-अप्रैल तक बाजार में आ जाती है। इस समय गर्मी बढ़ने लगती है और तरबूज की मांग अचानक तेज हो जाती है। शुरुआती सीजन में कीमतें सामान्य सीजन की तुलना में काफी बेहतर मिलती हैं। खासकर राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के गर्म व शुष्क इलाकों में यह समय तरबूज की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जनवरी की बुवाई से कीट और रोगों का दबाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है। अगर किसान ड्रिप सिंचाई और प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग करें, तो पानी की बचत के साथ-साथ पौधों की बढ़वार भी तेज होती है और फल की गुणवत्ता बेहतर बनती है।

तकनीक अपनाएँ तो बढ़ेगी उपज और गुणवत्ता

कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे तरबूज की खेती के लिए केवल प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करें। उन्नत किस्मों के साथ संतुलित खाद-उर्वरक प्रबंधन बहुत जरूरी है। गोबर की सड़ी खाद, आवश्यक मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश देने से पौधे मजबूत बनते हैं और फल का वजन भी अच्छा आता है।

ड्रिप सिंचाई से न केवल पानी की बचत होती है, बल्कि पौधों को जरूरत के अनुसार नमी भी मिलती रहती है। मल्चिंग करने से खरपतवार कम उगते हैं और मिट्टी का तापमान संतुलित बना रहता है, जिससे तरबूज की मिठास और आकार दोनों बेहतर होते हैं।

किसानों के लिए संदेश

अगर किसान इस बार जनवरी से तरबूज की खेती शुरू करते हैं और ICAR द्वारा अनुशंसित उन्नत किस्मों जैसे काशी मोहिनी और काशी पीतांबर को अपनाते हैं, तो यह फसल उनके लिए वाकई “बल्ले-बल्ले” साबित हो सकती है। कम लागत, ज्यादा उपज और शुरुआती बाजार में बेहतर दाम ये तीनों फायदे तरबूज की खेती को इस सीजन में बेहद आकर्षक बना रहे हैं। खेती शुरू करने से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से संपर्क कर तकनीकी सलाह जरूर लें, ताकि उत्पादन और मुनाफा दोनों अधिकतम किया जा सके।

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  • Shashikant

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