यूरिया सब्सिडी पर बड़ा खेल? Economic Survey में कीमत बढ़ाने का चौंकाने वाला सुझाव

देश में खेती के क्षेत्र में तकनीक और योजनाओं के बावजूद एक बड़ी समस्या लगातार सामने आ रही है, और वह है उर्वरकों का असंतुलित उपयोग। हाल के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने खास तौर पर यूरिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, किसान सस्ती कीमत के कारण नाइट्रोजन आधारित खाद का अधिक उपयोग कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।

मिट्टी की सेहत पर पड़ रहा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि जब खेत में जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन डाली जाती है तो मिट्टी की प्राकृतिक ताकत कमजोर होने लगती है। मिट्टी में जैविक तत्व घटते हैं, सूक्ष्म पोषक तत्व कम होते जाते हैं और जमीन की बनावट भी खराब होती है। कई इलाकों में यह भी देखा गया है कि खाद की मात्रा बढ़ाने के बाद भी पैदावार पहले जैसी नहीं बढ़ रही। इससे साफ है कि समस्या खाद की कमी नहीं बल्कि संतुलन की है।

पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ा

खेती में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलन बहुत जरूरी होता है। पहले यह संतुलन काफी हद तक ठीक माना जाता था, लेकिन समय के साथ किसान ज्यादा नाइट्रोजन पर निर्भर हो गए हैं। अन्य पोषक तत्व अपेक्षाकृत महंगे होने से उनका उपयोग कम हो रहा है। इससे फसल की गुणवत्ता और मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वरता प्रभावित हो रही है।

सब्सिडी व्यवस्था में बदलाव का सुझाव

आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि यूरिया की कीमत में थोड़ा बदलाव कर किसानों को उसी के बराबर राशि सीधे खाते में दी जाए। इसका मकसद यह है कि किसान की जेब पर बोझ न बढ़े, लेकिन खाद खरीदते समय उन्हें संतुलित उपयोग का संकेत मिले। आगे चलकर उर्वरक सब्सिडी को इनपुट की बजाय आय सहायता से जोड़ने की बात भी सामने आई है।

नई व्यवस्था से क्या होगा फायदा

अगर किसानों को प्रति एकड़ सहायता मिलेगी तो जो किसान पहले से संतुलित मात्रा में खाद डालते हैं, उन्हें सीधा लाभ मिलेगा। वहीं जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने वाले किसानों को सोच-समझकर खाद इस्तेमाल करने की प्रेरणा मिलेगी। इससे मिट्टी परीक्षण, जैविक खाद, नैनो यूरिया और अन्य आधुनिक विकल्पों के उपयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

फसल और क्षेत्र के हिसाब से योजना

हर फसल और हर इलाके की जरूरत अलग होती है। सिंचित क्षेत्रों में धान, गेहूं और गन्ने को ज्यादा पोषण चाहिए, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में स्थिति अलग होती है। इसलिए सहायता को क्षेत्र और फसल के अनुसार तय करने की बात कही गई है। सरकार के पास अब डिजिटल रिकॉर्ड और किसान डेटा उपलब्ध है, जिससे ऐसी व्यवस्था लागू करना संभव माना जा रहा है।

कुल मिलाकर, मकसद यही है कि किसान की आमदनी पर असर डाले बिना खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाया जाए। संतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी की सेहत सुधरेगी, लागत कम होगी और आने वाले वर्षों में खेती ज्यादा मजबूत बन सकती है।

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  • Shashikant

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